कुनिहार की शिव तांडव गुफा में शिव–पार्वती विवाह का दिव्य वर्णन, श्रद्धालु हुए भाव-विभोर

कुनिहार।
अनादि कालीन शिव तांडव गुफा, कुनिहार में आयोजित शिव महापुराण कथा के पावन अवसर पर भगवान शिव एवं माता पार्वती के विवाह प्रसंग का अत्यंत भावपूर्ण और दिव्य वर्णन किया गया। इस मंगल प्रसंग का रसपूर्ण व्याख्यान आचार्य बलवंत शांडिल्य द्वारा किया गया, जिसे सुनकर कथा पंडाल में उपस्थित श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।

आचार्य बलवंत शांडिल्य ने कथा में बताया कि हिमालय की पुत्री माता गौरा ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए राजसी वैभव और सुखों का त्याग कर कठोर तपस्या की। उन्होंने कठिन व्रत, उपवास और संयमित जीवन अपनाकर भोलेनाथ की आराधना की। माता पार्वती की अडिग श्रद्धा, निष्ठा और तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार किया।

कथा में यह भी उल्लेख किया गया कि माता गौरा की तपस्या केवल विवाह की कामना नहीं थी, बल्कि वह नारी शक्ति, आत्मबल, समर्पण और साधना का प्रतीक थी। सप्तर्षियों द्वारा माता की परीक्षा ली गई, जिसमें उनके विवेक, धैर्य और दृढ़ निश्चय की परीक्षा हुई। सभी परीक्षाओं में सफल होने के उपरांत देवताओं के आग्रह और माता की तपस्या से शिव–विवाह का शुभ संयोग बना।

शिव–पार्वती विवाह के प्रसंग का वर्णन होते ही कैलाश पर्वत से लेकर तीनों लोकों तक आनंद और उल्लास की लहर दौड़ गई। देवता, ऋषि, मुनि, गंधर्व और अप्सराएँ इस अलौकिक विवाह के साक्षी बने। भगवान शिव की भव्य बारात, माता पार्वती का सौम्य एवं दिव्य श्रृंगार तथा विवाह के पावन दृश्य का ऐसा सजीव वर्णन किया गया कि श्रोता स्वयं को कैलाश पर्वत में उपस्थित अनुभव करने लगे।

आचार्य बलवंत शांडिल्य ने अपने प्रवचन में कहा कि शिव–गौरा विवाह हमें यह संदेश देता है कि सच्ची भक्ति, धैर्य और तप से ईश्वर भी प्रसन्न होते हैं। यह विवाह केवल एक पौराणिक घटना नहीं, बल्कि गृहस्थ जीवन में संतुलन, समर्पण और आध्यात्मिक एकता का अनुपम उदाहरण है।

कथा के दौरान पूरा कथा स्थल “हर हर महादेव” और “जय माता पार्वती” के जयघोष से गूंज उठा। वातावरण पूर्णतः शिवमय हो गया और श्रद्धालु गहन भक्ति भाव में डूबे नजर आए।

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