
खबर अभी अभी ब्यूरो सोलन
15 मार्च 2023

पूर्व से पश्चिम हिमालय, ब्रह्मपुत्र, गंगा और सिंध नदी की घाटियाँ मिल कर एशिया के जल भण्डार का स्रोत हैं। हमारी सभ्यताओं का जन्म इन्हीं नदी घाटियों के किनारों पर हुआ। हमारे पूर्वजों ने इन नदियों को पूजा है, ये सदियों से हमारी आध्यात्मिक मान्यताओं, जीवन और आजीविका का स्रोत रही हैं। पाँच करोड़ लोग हिमालय कि नदी घाटियों में रहते हैं। इन नदियों का जल और पहाड़ों से अपने साथ लायी गई मिट्टी से बने दुनिया के दो सबसे बड़े मैदान- गंगा यमुना का दोआब और पंजाब का दोआब, हजारो करोड़ लोगों की खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करता है। इसके लिए अरुणाचल से जम्मू कश्मीर तक के 15 समूहों के युवा नदियों को बचाने के लिए एकजुट होकर आवाज उठा रहे हैं।
इन समूहों में अफेक्टेड सिटिजन ऑफ तीस्ता सिक्किम, क्लाइमेट फ्रंट इंडिया, क्लाइमेट फ्रंट जम्मू, सेव दिबांग अभियान, अरुणाचल प्रदेश, हियूंद पत्रिका, हिमाचल, हिमधरा पर्यावरण समूह, हिमाचल, इंडिजेनस पस्र्पेक्टिव, मणिपुर, जेद टैल्स, किन्नौर, हिमाचल, नो मींस नो अभियान, किन्नौर, महाकाली लोक संगठन, पिथौरागढ़, उत्तराखंड, स्पिती सिविल सोसायटी, लाहौल-स्पिती, सिक्किम प्रोग्रेसिव यूथ फोरम, सिक्किम, सीयांग व सुबनसीरि इंडिजेनस फोरम, अरुणाचल प्रदेश व असम, तांदी बांध संघर्ष समिति, लाहौल-स्पिती और वन गुज्जर ट्राइबल युवा संगठन, उत्तराखंड शामिल हैं।
अरुणाचल से लेकर कश्मीर तक नदी घाटियां जलवायु संकट के प्रभाव से जूझ रही हैं। ग्लेशियरों का पिघलाना और बर्फ गिरना कम करना, नदियों और जल स्रोतों को सुखाने की प्रक्रिया को और तेज कर रही हैं, जिससे सतह और भूजल में कमी आ रही है। इसके साथ बांध बनाने की योजनाएं नदियों और झरनों के सूखने का कारण बन रही हैं। अरुणाचल प्रदेश में भारत के सबसे बड़े बांध-3047 मेगावाट एटालिन परियोजना के निर्माण के लिए सरकार का जोर निंदनीय है।
वन, जो नदियों के जीवन के लिए महत्वपूर्ण हैं, इन बांध परियोजनाओं और अन्य मूर्खतापूर्ण वाणिज्यिक विशाल बुनियादी ढांचे द्वारा नष्ट हो रहे हैं। नदियों, नालों और तालाबों से रेत और बजरी का अनियमित खनन नदी प्रदूषण का एक और प्रमुख कारण है। हिमाचल, उत्तराखंड और सिक्किम के तराई क्षेत्रों में फार्मासूटिकल कंपनीयों ने नदियों को जहरीला डंपिंग जोन बना दिया है। बड़े पैमाने पर अनियंत्रित पर्यटन, युवाओं के लिए आजीविका का एकमात्र स्रोत बनते हुए, हिमालय में नदियों के विनाश में भी योगदान दे रहा है।
नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार सबसे अधिक पर्यटक हिमालयी राज्यों विशेष रूप से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर का दौरा कर रहे हैं। नगर निगम के ठोस कचरे को नदियों में अंधाधुंध फेंकना पर्यटन क्षेत्रों में आम बात है।
इस वर्ष के अंतर्राष्ट्रीय नदी अभियान दिवस का विषय “नदियों का अधिकार” है। दुनिया भर में नदी के अधिकारों की कानूनी मान्यता के लिए चिंतन चल रहा है। हालांकि, प्रयोग छोटे पैमाने पर किये गये हैं। भारत में नदियों के लिए कानूनी सुरक्षा पूरी तरह से अनुपस्थित है। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में गंगा और यमुना नदियों के संदर्भ में यह माना कि “नदी एक जीवित व्यक्ति की तरह अधिकार रखती है।
हालांकि यह निर्णय धरातल पर लागू होने से बहुत दूर है, इस फैसले ने नदियों के अधिकारों का संरक्षक ऐसे सरकारी नियामकों और अधिकारियों को बनाया है, जो नदियों के विनाश के सहभागी रहे हैं। चाहे वह प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड हो या वन विभाग सभी नदी पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण में विफल रहे हैं। इसके अलावा जो स्थानीय समुदाय ऐतिहासिक रूप से नदी जैसे प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करते आये हैं उन के पास इस विषय में कोई कानूनी अधिकार नहीं है। पर्यटन हो या खनन इस में ग्राम पंचायत, स्थानीय गांवों का को अधिकार देने की हम मांग करते हैं।
खबर अभी अभी ब्यूरो सोलन





