
हिमाचल प्रदेश पंचायती राज चुनाव 2026 के संदर्भ में प्रदेश सरकार द्वारा अधिसूचित हिमाचल प्रदेश पंचायती राज (निर्वाचन) संशोधन नियम, 2026 के उस प्रावधान को जनहित याचिका के माध्यम से माननीय उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है, जिसके तहत जिला उपायुक्तों को चुनावी आरक्षण रोस्टर में 5 प्रतिशत तक परिवर्तन करने की शक्तियां प्रदान की गई थीं। इस संशोधन को लेकर विधानसभा में भी संवैधानिक वैधता पर गंभीर सवाल उठे थे।
आज इस जनहित याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई माननीय उच्च न्यायालय की मुख्य खंडपीठ, जिसकी अध्यक्षता माननीय मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गुरमीत सिंह संधावालिया तथा न्यायमूर्ति विपिन चंद्र नेगी कर रहे थे, के समक्ष हुई। मुख्य खंडपीठ ने मामले की संवेदनशीलता एवं चुनावी समयबद्धता को देखते हुए इसे आज दोपहर 2 बजे माननीय खंडपीठ-1 के समक्ष सूचीबद्ध करने के आदेश पारित किए।
इसके उपरांत माननीय खंडपीठ-1, जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर एवं न्यायमूर्ति रंजन शर्मा कर रहे थे, ने याचिका पर विस्तृत सुनवाई की। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने प्रथम दृष्टया पाया कि उक्त संशोधित नियम संवैधानिक प्रावधानों, विशेषकर अनुच्छेद 243(डी) के तहत आरक्षण की व्यवस्था के प्रतिकूल प्रतीत होते हैं। इसी आधार पर माननीय न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिए कि उक्त संशोधित नियमों के आधार पर की जाने वाली कार्यवाही पर तत्काल प्रभाव से रोक रहेगी।
माननीय न्यायालय ने आगे यह भी निर्देशित किया कि इन नियमों के आधार पर जारी किए गए रोस्टर को निरस्त मानते हुए पुनः विधि अनुसार नई अधिसूचना जारी की जाए, ताकि पंचायती राज चुनाव संविधान एवं स्थापित वैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप संपन्न हो सकें। हाल के आदेशों में न्यायालय पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि चुनाव प्रक्रिया पूर्ववर्ती वैध पंचायत संरचना और विधिसम्मत रोस्टर के आधार पर ही आगे बढ़ेगी।





