
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कर्मचारी अपने अधिकारों के प्रति सजग नहीं हैं और लंबे समय बाद अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं, तो वे पिछले पूरे समय का वित्तीय लाभ (एरियर) पाने के हकदार नहीं होंगे। न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की अदालत ने यह आदेश मदन लाल एवं अन्य मामले में दिया है। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता पिछले 15 वर्षों से केवल अभ्यावेदन दे रहे थे, लेकिन उन्होंने समय पर कानूनी उपचार नहीं मांगा। कोर्ट ने कहा कि केवल पत्र लिखने से समय की सीमा नहीं बढ़ती।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता उन लोगों के साथ समानता का दावा नहीं कर सकते जो समय पर अदालत गए थे। जो कर्मचारी अपने हक के लिए सजग नहीं थे, उन्हें केवल काल्पनिक लाभ दिया जा सकता है, न कि पूरा पिछला एरियर।
अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए सरकार के 2010 के आदेश को सही ठहराया। सरकार ने पहले ही उदारता दिखाते हुए विसंगति दूर कर दी है और एरियर को 3 साल तक सीमित करने का फैसला कानूनी रूप से सही है। याचिकाकर्ता जो विभिन्न सरकारी विभागों में ऑडिटर के पद पर कार्यरत थे, उन्होंने अदालत से मांग की थी कि उन्हें उनके ज्वाइनिंग की तारीख से ही 1800-3200 रुपये का वेतनमान और उस पर 9 फीसदी ब्याज दिया जाए। उन्होंने तर्क दिया कि उनके जूनियर कर्मचारियों को समान काम के लिए समान वेतन के सिद्धांत पर संजीव कुमार महाजन बनाम हिमाचल राज्य मामले के बाद पूरा लाभ दिया गया था।राज्य सरकार ने 30 सितंबर 2010 को एक आदेश जारी कर इन याचिकाकर्ताओं को उच्च वेतनमान तो दे दिया था, लेकिन उनके वित्तीय एरियर को केवल 3 साल तक सीमित कर दिया था। याचिकाकर्ताओं ने इसी कटौती को अदालत में चुनौती दी थी।





