
ख़बर अभी अभी ब्यूरो सोलन
11 मई 2023

हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिला के लदरौर कस्बे के साथ लगते बरोटा गांव के रवि धीमान ने लकड़ी पर अपना हूनर दिखाकर सबको हैरान कर दिया है। रवि धीमान लकड़ी पर नकाशी कर 3डी आकृति बना रहे हैं। लेकिन उनका यह हूनर जग जाहिर नहीं हो पाया है। किसी ने भी रवि धीमान की इस कला को पहचानने का काम नहीं किया है। लकड़ी पर रवि की इस कलाकारी को देखकर हर कोई दंग है।
बरोटा गांव के रवि धीमान ने बताया कि बचपन से ही उन्हें चित्र कला से प्रेम था। इसी प्रेम को अमलीजामा पहनाने के लिए रवि ने लकड़ी पर 3डी आकृति बनाने की कला को अपना हूनर बना लिया है। आज इसी हुनर के चलते रवि धीमान अपना व्यवसाय भी कर रहे हैं। लेकिन रवि धीमान की लोगों तक पहुंच कम होने के कारण अपना कला को ख्याति नहीं दिला सके। रवि धीमान ने बताया कि लकड़ी पर चित्र बनाने की कला भारत में बहुत कम है, लेकिन बाहरी देशों में इस कला को लोगों द्वारा काफी पसंद किया जाता है। लेकिन भारत में यह कला धीरे धीरे समाप्ति के कगार पर पहुंच गई है। अगर सरकार इस पौराणिक कला को बढ़ावा दे, तो आने वाली पीढ़ी इस कला से अपने लिये अच्छी आमदनी कमा सकती है।
धीमान ने बताया कि लकड़ी पर 3 डी आकृति बनाने के लिए कड़ी मेहनत की जाती है। 20 से 25 दिनों में एक 3डी आकृति तैयार होती है, जिसकी कीमत 20 से 25 हजार रूपये के बीच में है। लकड़ी के टुकड़े पर 3डी आकृति बनाने के लिए लकड़ी के टुकडे की 15 इंच चौडाई, 22 इंच से 24 इंच तक लंबाई होती है, जिसके बाद 3डी आकृति बनती है।
रवि धीमान ने बताया कि आजादी के अमृत महोत्सव पर शहीद भगत सिंह, रविंद्र नाथ टैगोर, स्वामी विवेकानंद, सुभाष चंद्र बोस, पहाड़ी गांधी कांशी, डॉ. भीमराव अंबेडकर के अलावा केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर की भी एक 3डी आकृति बनाई थी, जिसे अनुराग सिंह ठाकुर को भेंट कर दिया है। मौजूदा समय में रवि ने हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू की भी एक 3डी आकृति बनाई है। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जेपी नड्डा की 3डी आकृति बनाने का काम किया जा रहा है। रवि धीमान ने बताया कि धीरे-धीरे लोगों में पहचान तो बन रही है। लेकिन आर्थिक रूप से किसी तरह की सरकार की ओर से मदद न होने के कारण हालात खराब हैं, वह अपनी इस कला को देश व प्रदेश को दिखाना चाहते हैं क्योंकि इस तरह की कला के बहुत ही कम कलाकार रहे हैं।
वहीं, स्थानीय निवासी मिलाप चंद की माने तो रवि धीमान के पूर्वज लकड़ी पर नकाशी करने का कार्य करते थे। उन्हीं से रवि धीमान ने या कला सीखने में महारत हासिल की है। रवि धीमान की इस कला को आगे पहुंचने का मौका नहीं मिला है। उन्होंने सरकार से मांग की है कि रवि धीमान इस कला को मंच प्रदान किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस कला को अपनाकर अपना रोजगार सुनिश्चित कर सकें।
वहीं, सूर्यांश धीमान ने बताया कि वह अपने पिता से इस कला को सीख रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनके पिता रवि धीमान जब लकड़ी पर इस तरह की चित्रकारी करते हैं तो उनके कामकाज में हाथ बंटाने का काम करते हैं।
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