
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने जंगलों में पिछले तीन वर्षों में आग की घटनाओं का सरकार से जिलावार ब्योरा तलब किया है। आग पर मैनुअल तरीके से काबू पाया गया था या नहीं, इस पर भी अदालत को अवगत कराने को कहा है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने कहा कि गर्मी के मौसम में आग लगने की घटनाएं होने की संभावना बढ़ जाती है। राज्य में वन अग्नि रेखाएं (फायरलाइन) कैसे बनाई जाएंगी। इस बारे में दायर जवाब में दीर्घकालिक दृष्टिकोण को ठीक से स्पष्ट नहीं किया गया है। जवाब में यह भी नहीं बताया गया है कि उन क्षेत्रों में आग को कैसे नियंत्रित किया जाएगा, जहां पर सड़क नहीं है या सड़क से पहुंच बहुत दूर है।
खंडपीठ ने कहा कि सवाल यह है कि क्या वनस्पति पैटर्न को बदलने के लिए कोई प्रयास किया गया है। खासकर जहां अत्यधिक ज्वलनशील चीड़ के पेड़ हैं और क्या इन क्षेत्रों को संभावित खतरे के रूप में चिह्नित किया गया है। अदालत ने सरकार से कहा है कि इस पर एक हलफनामा दायर किया जाए। इसमें स्पष्ट किया जाए कि दिशा-निर्देश क्या हैं, जिन्हें ध्यान में रखा जाना चाहिए और क्या संबंधित कर्मचारियों को आवश्यक निर्देश जारी किए गए हैं।
अदालत के 21 मार्च के आदेशों की अनुपालना करते हुए प्रदेश सरकार के विशेष निदेशक सह-पदेन (राजस्व-आपदा प्रबंधन) सचिव की ओर से हलफनामा दायर किया गया है। इसमें न्याय मित्र की ओर से दिए गए सुझावों के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है। इसमें विभिन्न जिलों में जल निकायों के पुनरुद्धार की मांग की गई है और मनरेगा के फंड का उपयोग कैच द रेन अभियान के तहत जल संचयन पर विशेष ध्यान देने को कहा गया है। अदालत ने कहा कि प्रतिवादी मुख्य वन संरक्षक द्वारा दायर उत्तर में सैद्धांतिक रूप में केवल इस बारे में बताया गया है कि वर्ष 2022 में क्या कार्यवाही की गई है और आग को कैसे नियंत्रित किया गया और इस तरह के क्या कदम उठाए गए।





