
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने ऑटो रिक्शा परमिट को लेकर वर्षों से चली आ रही एक शर्त को खत्म कर दिया है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार की यह शर्त कि ऑटो का मालिक ही उसे चलाएगा, न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि सांविधानिक अधिकारों का भी उल्लंघन है। अदालत ने कहा है कि ऑटो मालिक की बीमारी या मृत्यु की स्थिति में अब दूसरा व्यक्ति भी ऑटो चला सकेगा।
गौरतलब है कि सतपाल और अन्य याचिकाकर्ताओं ने अदालत में गुहार लगाई थी कि परिवहन विभाग परमिट देते समय यह अनिवार्य शर्त लगाता है कि ऑटो रिक्शा का मालिक स्वयं ही वाहन चलाएगा। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह नियम तब मुसीबत बन जाता है, जब मालिक बीमार है और कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहा हो या किसी दुर्घटना के कारण विकलांग हो जाए। ऐसी स्थिति में मालिक न तो खुद ऑटो चला पाता था और न ही किसी और को चालक के तौर पर रख सकता था, जिससे उसकी रोजी-रोटी का साधन छिन जाता था।
अदालत ने मौखिक आदेश में कहा था कि यह प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 के तहत मिले मौलिक अधिकारों पर उचित प्रतिबंध की श्रेणी में नहीं आता है। यदि किसी ऑटो मालिक की मृत्यु हो जाती है और उसकी विधवा के पास गुजारे का कोई और साधन नहीं है, तो क्या वह किसी ड्राइवर को रखकर ऑटो नहीं चलवा सकती, यह पूरी तरह से मनमाना है। अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि यदि सरकार को डर है कि अमीर लोग इसका फायदा उठाएंगे, तो वह प्रति व्यक्ति केवल एक परमिट जारी करने की शर्त लगा सकती है, लेकिन मालिक को स्वयं ही वाहन चलाने के लिए मजबूर करना गलत है।
इसके बाद सरकार ने नियमों में बदलाव करके नई व्यवस्था लागू की है। हाईकोर्ट की सख्ती के बाद राज्य परिवहन प्राधिकरण के सचिव ने नए निर्देश जारी किए हैं, जिन्हें अदालत ने रिकॉर्ड पर लिया है। यदि परमिट धारक बीमार, चिकित्सकीय रूप से अनफिट या शारीरिक रूप से अक्षम हो जाता है, तो वह वैध लाइसेंस वाले ड्राइवर को काम पर रख सकता है। परमिट धारक की मृत्यु की स्थिति में उसकी विधवा या कानूनी वारिस को ड्राइवर रखने की अनुमति होगी। प्रवर्तन विंग को निर्देश दिए कि वे केवल इस आधार पर चालान न काटें कि मालिक खुद ऑटो नहीं चला रहा है।
सरकार की दलील… कर्मचारी ने पेंशन के लिए नहीं चुना विकल्प
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने एकल पीठ के उस फैसले के कार्यान्वयन पर रोक लगा दी है, जिसमें एक सेवानिवृत्त वन कर्मचारी को पेंशन लाभ देने के निर्देश दिए गए थे। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने राज्य सरकार की ओर से दायर अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत में सरकार की ओर से दलील दी गई कि याचिकाकर्ता ने पेंशन के लिए तय समयसीमा के भीतर अपना विकल्प ही नहीं चुना था। 4 मई 2023 की नोटिफिकेशन के मुताबिक, पेंशन लाभ पाने के लिए 60 दिनों के भीतर आवेदन करना जरूरी था, जो नहीं किया गया। ऐसे में एकल जज की ओर से पेंशन पर विचार करने का निर्देश देना कानूनी रूप से सही नहीं है। खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए एकल पीठ की ओर से 3 सितंबर 2025 को दिए गए फैसले के निष्पादन पर अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने अब प्रतिवादी को नोटिस जारी किया है और सुनवाई 1 अप्रैल के लिए निर्धारित की है।
संशोधित पेंशन लाभ मामले में 2 मार्च को होगी अंतिम बहस
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में 2016 से 2021 के बीच सेवानिवृत्त कर्मचारियों के संशोधित पेंशन और वित्तीय लाभों से संबंधित मामले में अब 2 मार्च को अंतिम बहस होगी। सरकार ने इस मामले में अपना पक्ष 6 और 7 जनवरी को रख दिया था। इसके बाद अब याचिकाकर्ताओं की ओर से सरकार की दलीलों का खंडन किया जाएगा। इस मामले की सुनवाई न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ कर रही है। सेवानिवृत्ति कर्मचारियों ने हाईकोर्ट से मांग की है कि उन्हें अभी तक संशोधित वेतनमान का लाभ नहीं मिला है।
मनी लॉन्ड्रिंग मामला : निशांत की जमानत पर सुनवाई 2 मार्च को
हाईकोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आरोपी असिस्टेंट ड्रग कंट्रोलर निशांत सरीन की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए प्रतिवादी ईडी को नोटिस जारी किया है। अदालत ने अगली सुनवाई को ईडी को मामले में स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया है। न्यायाधीश वीरेंद्र सिंह की अदालत अब मामले की सुनवाई 2 मार्च को करेगी। असिस्टेंट ड्रग कंट्रोलर निशांत सरीन की जमानत याचिका जिला अदालत शिमला ने खारिज कर दी थी। आरोपी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी है। आरोपी पर प्रवर्तन निदेशालय की ओर से भ्रष्टाचार और आय से अधिक संपत्ति के जरिये मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप लगाए गए हैं।





