Himachal: एफआरए मामलों में ढिलाई बरतने वाले उपायुक्तों की एसीआर में होगी रेड एंट्री, जानें पूरा मामला

हिमाचल प्रदेश सरकार ने वन अधिकार अधिनियम 2006 (एफआरए) के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए जिला प्रशासन की जवाबदेही तय करने का फैसला किया है। राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी ने कहा कि अब उपायुक्तों सहित जिला स्तर के अधिकारियों की वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन (एसीआर) में यह दर्ज किया जाएगा कि उन्होंने एफआरए के मामलों में कितना काम किया। लापरवाही पाए जाने पर एसीआर में रेड एंट्री तक की कार्रवाई की जा सकती है। सरकार ने यह भी तय किया है कि कानून की गलत व्याख्या करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों पर एफआरए की धारा-7 के तहत 1000 रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा।
उन्होंने कहा कि पिछले तीन साल में प्रदेशभर में कार्यशालाओं और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को एफएआर के बारे में जागरूक किया गया है। किन्नौर से लेकर धर्मशाला, मंडी और सोलन तक आयोजित प्रशिक्षण शिविरों पर करीब 70 लाख रुपये खर्च किए गए। इसके बावजूद प्रदेश में इस कानून के तहत मामलों की संख्या 1,000 से आगे न बढ़ना सरकार के लिए चिंता का विषय है। अधिकारियों और कर्मचारियों की ओर से कानून को गंभीरता से न लेने के बाद सरकार ने सख्ती बरतने का फैसला लिया है। राजस्व विभाग के अनुसार पात्र व्यक्तियों को अधिकतम चार हेक्टेयर तक वन भूमि का अधिकार दिया जा सकता है। इसके लिए प्रक्रिया को सरल बनाते हुए केवल गांव के बुजुर्गों के बयान और पहचान को पर्याप्त प्रमाण माना गया है। सरकार का मानना है कि यह एक सामाजिक कानून है, जिसके सही क्रियान्वयन से लाखों लोगों को भूमि अधिकार मिल सकते हैं।

क्या है वन अधिकार अधिनियम
वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) 2006 का मुख्य उद्देश्य अनुसूचित जनजातियों और पारंपरिक वनवासियों को वन भूमि पर मालिकाना हक प्रदान कर उनके आजीविका संबंधी अधिकारों को सुरक्षित करना है। इसके तहत पात्र व्यक्ति को खेती या आवास हेतु 4 हेक्टेयर तक सरकारी वन भूमि आवंटित की जा सकती है। इस कानून के तहत वह जनजातीय और अन्य वनवासी पात्र हैं जो कम से कम तीन पीढ़ियों से वन भूमि पर निर्भर हैं। साक्ष्य के रूप में गांव के दो बुजुर्गों (60 वर्ष से अधिक आयु) के बयान और एक पहचान पत्र (जैसे परिवार रजिस्टर या वोटर कार्ड) पर्याप्त माना जाता है। इसमें सर्वाधिक शक्तियां ग्राम सभा को दी गई हैं। प्रत्येक पंचायत एक वन अधिकार समिति (एफआरसी) गठित करती है जो दावों का मौके पर जाकर निरीक्षण कर रिपोर्ट तैयार करती है। ग्राम सभा के 50 प्रतिशत अनुमोदन के बाद प्रस्ताव को उप-मंडलीय (एसडीएलसी) और फिर जिला स्तरीय समिति (डीएलसी) को अंतिम निर्णय हेतु भेजा जाता है।

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