
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) की उस अपील को खारिज कर दिया है, जिसमें एक योग्य छात्रा को मेडिकल कॉलेज में प्रवेश देने के हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी। शीर्ष अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि सरकारी संस्थानों में मेडिकल की सीटें राष्ट्रीय संसाधन हैं, जिन्हें प्रशासनिक सुस्ती या धोखाधड़ी के कारण बर्बाद नहीं होने दिया जा सकता। न्यायाधीश जेके माहेश्वरी और न्यायाधीश अतुल एस चांदुरकर की पीठ ने कहा कि सरकारी संस्थानों में मेडिकल की सीटें जन विश्वास की धरोहर हैं।
मेडिकल की सीटें किसी व्यक्ति का निजी लाभ नहीं, बल्कि राष्ट्र की अनमोल संपत्ति हैं। प्रशासनिक सुस्ती के कारण किसी योग्य छात्र के करिअर की बलि नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रवेश की समयसीमा (कट ऑफ डेट) प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने के लिए है, न कि किसी योग्य उम्मीदवार के अधिकारों का गला घोंटने के लिए। यदि किसी सीट पर धोखाधड़ी से कब्जा किया गया है, तो अधिकारियों का यह कर्तव्य है कि वे उसे तुरंत मेरिट सूची के अगले उम्मीदवार को प्रदान करें।
चूंकि यह मामला पिछले तीन वर्षों से अदालतों में लंबित था, सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए निर्देश दिया कि संजना ठाकुर को अब शैक्षणिक वर्ष 2026-2027 के लिए एमबीबीएस कोर्स में प्रवेश दिया जाए। कोर्ट ने इसके साथ ही हिमाचल हाईकोर्ट की ओर से राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग और प्रदेश सरकार पर जुर्माने के तौर पर दो-दो लाख याचिकाकर्ता को देने के हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा है।
उल्लेखनीय है कि यह विवाद 2022-23 के शैक्षणिक सत्र का है। हिमाचल प्रदेश की संजना ने एनईईटी यूजी परीक्षा में 508 अंक प्राप्त किए थे। काउंसलिंग के दौरान दो अन्य छात्रों ने फर्जी स्कोरकार्ड के आधार पर शिमला और चंबा के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीटें हासिल कर ली थीं।
जब जनवरी 2023 में इस धोखाधड़ी का पता चला, तो उनके प्रवेश रद्द कर दिए गए। प्रतिवादी मेरिट सूची में अगली उम्मीदवार थी, उन्होंने तुरंत खाली हुई सीट पर दावेदारी पेश की। हालांकि, विश्वविद्यालय द्वारा एनएमसी को सूचित किए जाने के बावजूद आयोग ने पांच महीने की देरी से जवाब दिया और नियमों का हवाला देते हुए प्रवेश देने से इन्कार कर दिया। हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि छात्रा की कोई गलती नहीं थी। उसने समय पर कानूनी रास्ता अपनाया। एनएमसी और विश्वविद्यालय ने देरी की और मामले को लटकाए रखा। हाईकोर्ट ने अधिकारियों को आदेश दिया कि वह छात्रा को 2023-24 सत्र में प्रवेश दें और उसे हुई मानसिक प्रताड़ना के लिए 2 लाख का मुआवजा और 10,000 कानूनी खर्च के रूप में भुगतान करें।





