
हिमाचल प्रदेश के बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ (बीबीएन) औद्योगिक क्षेत्र में व्यवसायिक गैस सिलिंडर की कमी के कारण उद्योगों में कामगारों के लिए भोजन तैयार करने में परेशानी आने लगी है। अभी तक उद्योग संचालक पुराने स्टॉक और महंगे दामों पर सिलिंडर लेकर व्यवस्था चला रहे हैं, लेकिन आने वाले समय में स्थिति और गंभीर होने की आशंका जताई जा रही है। बीबीएन में छोटे-बड़े करीब ढाई हजार उद्योग हैं। इनमें लगभग 3.50 लाख कामगार हैं। इनमें से करीब 80 प्रतिशत उद्योग ऐसे हैं जहां कामगारों को सुबह और शाम दोनों समय भोजन उपलब्ध कराया जाता है। इसके लिए अधिकांश उद्योगों में कैंटीन की व्यवस्था है, जहां भोजन एलपीजी गैस से तैयार किया जाता है। इन दिनों व्यावसायिक एलपीजी सिलिंडर की सप्लाई प्रभावित हो गई है। बताया जा रहा है कि पहले अस्पतालों को गैस की आपूर्ति की जाएगी और उसके बाद ही उद्योगों और अन्य संस्थानों को सिलिंडर उपलब्ध कराए जाएंगे।
बीबीएन के उद्योगों में प्रतिदिन लगभग 300 से 500 गैस सिलिंडर की खपत होती है। भोजन तैयार करने के अलावा कई उद्योगों में एलपीजी का उपयोग उत्पादन प्रक्रिया में भी किया जाता है। गत्ता उद्योग और फार्मा उद्योगों में दवा निर्माण के लिए भी एलपीजी गैस का प्रयोग होता है। गैस की कमी के चलते अब उद्योगपति इसके विकल्प तलाशने में जुट गए हैं।
केस स्टडी – 1
वर्धमान धागा मिल के उपाध्यक्ष मोहन जांगड़ा ने बताया कि उनकी कंपनी में करीब 10 हजार कामगार दोनों समय भोजन करते हैं। ऐसे में प्रतिदिन 25 से 30 गैस सिलिंडर की जरूरत पड़ती है। अब सिलिंडर न मिलने से भोजन तैयार करने में परेशानी आने लगी है।
केस स्टडी – 2
बिरला धागा मिल के उपाध्यक्ष एके तिवारी ने बताया कि उनकी कंपनी में करीब दो हजार कामगारों के लिए भोजन तैयार किया जाता है। सिलिंडर की कमी के कारण कैंटीन संचालक को अधिक कीमत देकर तीन दिन की गैस का इंतजाम करना पड़ा है। यदि इसके बाद गैस उपलब्ध नहीं हुई तो स्थिति और कठिन हो सकती है। उन्होंने कहा कि उद्योग में काम कुछ समय के लिए धीमा हो सकता है, लेकिन कामगारों को भोजन उपलब्ध कराना अनिवार्य है।
कच्चे माल की जमाखोरी, महंगी हो सकती हैं दवाएं
खाड़ी देशों में चल रहे युद्ध और कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर अब दवा उद्योग पर भी पड़ने लगा है। युद्ध बढ़ने आशंका के बीच दवा निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल और एपीआई (एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रेडिएंट) की जमाखोरी शुरू हो गई है। इसके कारण बाजार में कच्चे माल की कमी पैदा हो रही है और दवाओं की कीमतें बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि सप्लायरों ने युद्ध का हवाला देते हुए पहले ही कच्चे माल का भंडारण शुरू कर दिया है। खासकर चीन से आने वाले एपीआई के दामों में करीब 50 फीसदी तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसका असर दवा निर्माण की लागत पर पड़ रहा है।
जानकारी के अनुसार कई दवाओं के कच्चे माल के दाम में अचानक उछाल आया है। अमोक्सीसिलिन पहले 1780 रुपये प्रति किलो मिलता था, जो अब करीब 2500 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है। पेरासिटामोल का दाम 240 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 400 रुपये प्रति किलो हो गया है। निमोस्लाइड पहले 400 रुपये प्रति किलो था, जो अब 600 रुपये प्रति किलो मिल रहा है। मेटफोरमिन 160 रुपये प्रति किलो से बढ़कर करीब 300 रुपये प्रति किलो हो गया है। वहीं आईसोप्रोपाइल एल्कोहल का दाम 115 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 150 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है। सेफ्ट्रिएक्सोन का भाव भी 6300 रुपये प्रति किलो से बढ़कर करीब 7500 रुपये प्रति किलो हो गया है।
पोलो फार्मा के संचालक सुरेश गर्ग ने ये कहा
पोलो फार्मा के संचालक सुरेश गर्ग ने बताया कि क्रूड ऑयल से मिनरल स्पिरिट (सॉल्वेंट) तैयार होता है, जिसका उपयोग दवा उद्योगों में कच्चा माल तैयार करने के लिए किया जाता है। कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित होने से सॉल्वेंट की उपलब्धता भी कम हो रही है। उन्होंने कहा कि इस जमाखोरी का सबसे ज्यादा असर छोटे उद्योगों पर पड़ रहा है। उद्योगों में अचानक मांग नहीं बढ़ी है, लेकिन कुछ लोग युद्ध का हवाला देकर अनावश्यक भय का माहौल बना रहे हैं, जिससे कच्चे माल के दाम प्रभावित हो रहे हैं। भारत उद्योग संघ के प्रदेशाध्यक्ष चिरंजीव ठाकुर ने बताया कि बीबीएन के दवा उद्योगों में अधिकतर कच्चा माल चीन से आता है। अचानक कच्चे माल की किल्लत के कारण सप्लायरों ने भाड़े और सप्लाई के नाम पर दरों में बढ़ोतरी कर दी है। उन्होंने कहा कि कच्चा माल महंगा होने से दवा उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ जाएगी, जिसका असर आने वाले समय में दवाओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है।





