
#खबर अभी अभी शिमला ब्यूरो*
17 नवम्बर 2022
हिमाचल की सियासत में कांगड़ा जिला ही राजनीतिक दलों के लिए सत्ता की राह तैयार करता रहा है। माना जाता है कि कांगड़ा से जिस दल की जितनी ज्यादा सीटें, उतनी ही उसके सत्ता में आने की गारंटी पक्की होती है। वर्ष 1998 से चुनाव-दर-चुनाव हिमाचल की सियासत में यह ट्रेंड चलता आ रहा है। बारी-बारी प्रदेश की सत्ता संभालते आए भाजपा और कांग्रेस इस जिले से 9 से लेकर 11 सीटें जीतकर प्रदेश की सियासत के सिरमौर बनते रहे हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टियों और उसके नेताओं का ज्यादा फोकस भी कांगड़ा की जंग पर रहता आया है। इसी कड़ी में वर्ष 2022 की चुनावी जंग में भी दोनों दलों ने ध्यान केंद्रित कर अपने-अपने प्रत्याशियों के लिए दिन-रात पसीना बहाया है।
2007 में भाजपा के नौ और कांग्रेस के चार प्रत्याशी जीते। बसपा का एक और एक निर्दलीय जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। तब सरकार भाजपा की बनी। 2012 में फिर कांग्रेस की सरकार बनी, उस दौरान भी कांगड़ा जिले से 10 सीटें कांग्रेस, भाजपा की तीन और दो निर्दलीय की रहीं। 2017 के विधानसभा चुनाव में 11 सीटें भाजपा, चार कांग्रेस को मिलीं। एक निर्दलीय उम्मीवार जीता। ऐसे में प्रदेश में अभी भाजपा की सरकार है। अब वर्ष 2022 चुनावी जंग निपट चुकी है और इंतजार आठ दिसंबर को आने वाले नतीजों का है। अब यह देखना दिलचस्प रहेगा कि इस बार कांगड़ा जिला किस पार्टी के लिए सत्ता की राह को तैयार करता है।
जिला कांगड़ा से शांता कुमार रहे हैं मुख्यमंत्री
प्रदेश के सबसे बड़े और सबसे ज्यादा विधानसभा सीटों वाले जिला कांगड़ा से एक ही बार मुख्यमंत्री बना है। वर्ष 1977 में शांता कुमार मुख्यमंत्री बने थे। प्रदेश की राजनीति में बड़ी भूमिका होने के बावजूद कांगड़ा को शांता कुमार के बाद दूसरा मुख्यमंत्री नहीं मिला है।
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