कुनिहार की शिव तांडव गुफा में शिव महापुराण कथा के चौथे दिन उमड़ा भक्ति का सैलाब, नीलकंठ प्रसंग ने किया भावविभोर

कुनिहार
अनादिकालीन शिव तांडव गुफा, कुनिहार में आयोजित शिव महापुराण कथा के चौथे दिवस श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण का अद्भुत संगम देखने को मिला। कथा वाचन के दौरान आचार्य बलवंत शांडिल्य ने भगवान भोलेनाथ के पूजन एवं अभिषेक की महिमा का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को विधि-विधान और भावनात्मक समर्पण का महत्व समझाया।

आचार्य ने बताया कि शिवलिंग पर दूध, दही, शक्कर तथा गंगाजल अर्पित करने की परंपरा केवल आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना का माध्यम भी है। उन्होंने कहा कि अभिषेक करते समय मन की शुद्धता, श्रद्धा और निष्काम भाव अत्यंत आवश्यक हैं, तभी साधक को पूर्ण फल की प्राप्ति होती है।

कथा के मध्य आचार्य ने समुद्र मंथन के प्रसंग का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने बताया कि जब मंथन से भयंकर विष ‘हलाहल’ निकला और समस्त सृष्टि संकट में पड़ गई, तब भगवान शिव ने संपूर्ण जगत की रक्षा के लिए उस विष को अपने कंठ में धारण किया। इसी कारण वे नीलकंठ महादेव के नाम से विख्यात हुए। इस प्रसंग के श्रवण के साथ ही पंडाल “हर-हर महादेव” के जयघोष से गूंज उठा और वातावरण शिवमय हो गया।

कथा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने भक्ति भाव से भगवान शिव की महिमा का गुणगान किया तथा आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित कर स्वयं को धन्य महसूस किया। चौथे दिवस की कथा ने भक्तों के मन में शिव भक्ति की गहरी छाप छोड़ी और पूरे क्षेत्र में धार्मिक उल्लास का माहौल बना रहा।
भक्ति, त्याग, साधना और जीवन के विष को अमृत में बदलने की प्रेरणा पर आधारित रही। आचार्य ने बताया कि भगवान शिव केवल देवों के देव ही नहीं, बल्कि भोलानाथ हैं जो सच्चे मन से पुकारने पर अपने भक्तों की हर पीड़ा हर लेते हैं।
शिव महापुराण के प्रसंगों में यह समझाया गया कि शिव आराधना का मूल तत्व बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धता और सच्चा भाव है। शिवलिंग पर जल या दूध चढ़ाने से पहले मन को निर्मल बनाना, क्रोध, अहंकार और लोभ का त्याग करना ही सच्ची पूजा है।

समुद्र मंथन प्रसंग को जीवन के प्रतीक के रूप में भी समझाया गया जैसे समुद्र मंथन में अमृत से पहले विष निकला, वैसे ही जीवन में सफलता से पहले कठिनाइयाँ आती हैं। भगवान शिव द्वारा हलाहल विष को कंठ में धारण करना यह संदेश देता है कि महान व्यक्ति वही है जो समाज और सृष्टि की भलाई के लिए कष्ट सहने को तैयार हो।

आचार्य ने आगे बताया कि नीलकंठ प्रसंग हमें धैर्य, करुणा और परोपकार की शिक्षा देता है। जब संसार संकट में हो, तब व्यक्तिगत सुख-दुख से ऊपर उठकर दूसरों की रक्षा करना ही सच्चा धर्म है।

इसी संदेश के साथ कथा स्थल पर उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर हो उठे और “हर-हर महादेव” के जयघोष से पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा।

Share the news