
#खबर अभी अभी सोलन ब्यूरो*
24 अप्रैल 2023
राष्ट्रीय भाजपा हाईकमान ने हिमाचल प्रदेश का प्रदेश अध्यक्ष बदलकर जहां एक ओर डॉ. राजीव बिंदल को पुरानी प्रतिष्ठा दोबारा प्राप्त करने का मौका दिया है, वही दूसरी ओर सुरेश कश्यप को पद मुक्त करके उन्हें लोकसभा चुनाव की तैयारी करने का संकेत दे दिया गया है। आपको बता दें कि सुरेश कश्यप पर उदासीनता के आरोप लग रहे थे तो दूसरी ओर कांग्रेस उन्हें अपने संसदीय क्षेत्र में चुनाव के बाद दर्शन न देने का आरोप लगाते हुए गुमशुदा घोषित करने पर आमादा थी। उधर, बिंदल कोविड काल में भ्रष्टाचार में शामिल होने के आरोपों के बाद प्रदेश अध्यक्ष पद छोड़ने को मजबूर तो हुए ही नाहन से विधानसभा का चुनाव भी वे नहीं जीत सके। और वे भी विधानसभा चुनाव के बाद राजनीति का शिकार हो चुके थे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने हिमाचल और दिल्ली के प्रदेश महामंत्री संगठन के पदों में भी तब्दीली करके पार्टी को आगे ले जाने का प्रयास किया जा रहा है
यूनिवर्सिटी सीनियोरिटी के हिसाब से डॉ. बिंदल का प्रदेश अध्यक्ष बनना कोई नई नवेली बात नहीं है, लेकिन एक बार आरोप लगने पर पद छोड़ने वाले नेता को कुछ ही वर्ष बाद दोबारा से वही पद सौंप देने को विपक्ष भाजपा के चाल चरित्र और चेहरे के नारे के अनर्थ के रूप में प्रयोग करने की तैयारी में जुट गया है।
पहले उप चुनाव और फिर विधानसभा चुनावों में भाजपा को करारी मात देने वाली कांग्रेस को डॉ. बिंदल और सुरेश कश्यप दोनों को ही आसान टारगेट मान रही है। वह लोकसभा चुनाव में शिमला संसदीय सीट से सुरेश कश्यप को टिकट दिए जाने की स्थिति में उन पर उदासीनता बरतने का जोरदार हमला बोल सकती है। इसके लिए वह सुरेश कश्यप को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाए जाने के घटनाक्रम को सबूत के तौर पर पेश कर सकती है। उधर कांग्रेस के नव नियुक्त प्रदेश अध्यक्ष डॉ. बिंदल पर भी इसी तरह के हमले बोल सकती है। उसका कहना है कि भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते 27 मई 2020 को अध्यक्ष पद छोड़ने वाले डॉ. बिंदल को किस मजबूरी के चलते भाजपा हाईकमान ने लगभग तीन साल बाद फिर से अध्यक्ष पद का ताज सौंप दिया।
जो भी हो यह सच है कि सुरेश कश्यप के प्रदेश अध्यक्ष पद पर रहते हुए हिमाचल भाजपा की ओर से आलाकमान को कोई बड़ी खुशखबरी नहीं मिल सकी। कुछ राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि सुरेश कश्यप को विधानसभा चुनावों में मिली करारी शिकस्त के चलते ही पार्टी ने अध्यक्ष पद से हटाया है। कहा जाता रहा है कि जयराम शासनकाल में सुरेश कश्यप मुख्यमंत्री के लाउडस्पीकर के सिवाये कुछ नहीं थे। लेकिन कुछ विश्लेषक मानते हैं कि पार्टी हाईकमान ने उन्हें अब प्रदेश अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी से मुक्त करते हुए उन्हें अपनी लोकसभा सीट में काम करने का मौका दिया है ताकि पिछली गलतियों को सुधारकर वे अगले चुनाव की तैयारी कर सकें।
डॉ. राजीव बिंदल के समर्थक उन्हें मिली नई जिम्मेदारी को भले ही उनके मान सम्मान से जोड़कर देखें, लेकिन यह भी सच है कि आम चुनाव से ठीक पहले पार्टी ने उन्हें कांटों भरा ताज सौंपा है। इसकी पहली परीक्षा कुछ ही दिनों बाद नगर निगम शिमला के चुनावों में हो जाएगी। विधानसभा चुनावों के बाद डॉ. बिंदल के कंधों पर ठंडी सी पड़ चुकी भाजपा में नई ऊर्जा व स्फूर्ति भरने की जिम्मेदारी होगी। हालांकि, लोकसभा चुनाव के नतीजे प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता, उनके पिछले दस वर्षों के काम काज व उनकी छवि पर निर्भर करेंगे ऐसे में सुरेश कश्यप के लिए राह कुछ आसान हो सकती है। लेकिन आम चुनावों में भाजपा ने यदि पिछला प्रदर्शन नहीं दोहराया तो तय है कि उस असफलता का सारा ठीकरा डा. बिंदल के सिर ही फूटेगा। जो भी हो भाजपा हाईकमान ने प्रदेश अध्यक्ष व संगठन महामंत्री पदों पर की गई इस फेर बदल से संकेत दे दिया है कि पार्टी नेताओं व कार्यकर्ताओं को अब इलेक्शन मोड में आ जाना चाहिए।
#खबर अभी अभी सोलन ब्यूरो*





