
ख़बर अभी अभी ब्यूरो सोलन
23 मई 2023

बीते कुछ वर्षों से हिमाचल प्रदेश की प्रमुख नकदी फसल सेब का कुल उत्पादन राज्य में गिर रहा है। साल 2022-23 की आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार, जहां हिमाचल में सेब की खेती के तहत क्षेत्र में वृधि हुई है, तो वहीं पिछले एक दशक में वार्षिक उपज में गिरावट आई है। 2010-11 में 8.92 लाख मीट्रिक टन से अधिक की उच्चतम वार्षिक उपज दर्ज की गई थी, लेकिन तब से हिमाचल इस आंकड़े को पार नहीं कर पाया है। जबकि कुल उपज 2011-12 में घटकर 2.75 लाख मीट्रिक टन और 2018-19 में 3.68 लाख मीट्रिक टन रह गई, जबकि पिछले साल सेब का उत्पादन 6.11 लाख मीट्रिक टन था।
सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार, पहाड़ी राज्य में इस साल 6.74 लाख मीट्रिक टन से अधिक सेब की कुल उपज दर्ज करने की उम्मीद है, जो पिछले साल की तुलना में अधिक है। राज्य के कुल फल उत्पादन में सेब का हिस्सा लगभग 85% है। सेब की फसल भी राज्य में फलों की खेती के तहत कुल भूमि क्षेत्र का लगभग आधा हिस्सा है। राज्य में सेब की खेती का रकबा 1950-51 में 400 हेक्टेयर से बढ़कर 2021-22 में 1,15,016 हेक्टेयर हो गया है। 2007-08 से सेब की खेती के तहत क्षेत्र में 21.4% की वृद्धि दर्ज की गई। बावजूद इसके प्रदेश में सेब के उत्पादन में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई। सेब उत्पादकों और विशेषज्ञों के अनुसार सेब का उत्पादन घटने के पीछे मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन है। मौसम में आये बदलाव के कारण हिमाचल प्रदेश में सेब बेल्ट लगभग 1,000 फीट तक स्थानांतरित हो गयी है। पहले हमें समुद्र तल से 4000 से 5000 फीट की ऊंचाई पर अच्छी गुणवत्ता वाले सेब मिलते थे, लेकिन इतनी ऊंचाई पर गुणवत्ता के साथ-साथ मात्रा भी प्रभावित हुई है। अब, अच्छी गुणवत्ता वाला सेब केवल 6,000 फीट से ज्यादा की ऊंचाई पर स्थित पेड़ों पर ही उगता है। तापमान में हो रही बढ़ोतरी के कारण यह सेब पट्टी हिमालय के अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों तक सिमट रही है। बरसात के चक्र और इसके स्वरूप में बदलाव के साथ तापमान में बढ़ोतरी से फल उत्पादन पट्टी ऊपर की ओर खिसक रही है। इससे सेब के उत्पादन में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। सर्दियों में भी गर्म तापमान जैसे प्रतिकूल जलवायु परिवर्तनों के कारण हिमाचल प्रदेश में सेब की उत्पादकता में काफी गिरावट हुई है।
गौरतलब है कि सर्दियों के दौरान ठंड कम होने से कुल उत्पादन के साथ-साथ सेब की गुणवत्ता पर भी असर पड़ा है। सर्दियों के दौरान असामान्य रूप से गर्म मौसम, बेमौसम बारिश या बिल्कुल भी बारिश नहीं देख रहे हैं। सेब के घटते उत्पादन में ये सभी जलवायु गड़बड़ी एक प्रमुख कारक रहे हैं। रॉयल डिलीशियस जैसी पुरानी सेब किस्मों को 7 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान के 1200-1400 चिलिंग घंटों की आवश्यकता होती है। वहीं नई किस्मों को ठीक से फूलने और फल देने के लिए 300-500 चिलिंग आवर्स की आवश्यकता होती है।
सेब उत्पादकों के अनुसार, एक अन्य प्रमुख कारण सेब की पुरानी किस्मों का उखड़ना था। जाहिर है हिमाचल प्रदेश में अभी भी सेब की पुरानी वैरायटी लगी हुई है, जिन पर सेव का उत्पादन पूरी तरह से मौसम पर निर्भर करता है। सेब के उत्पादन का कम होने का एक और कारण पुराने पेड़ों की जगह नई किस्मों के सेब के पेड़ लगाना भी है।
बागवान टीकम ठाकुर का कहना है कि सेब का घटता उत्पादन परेशानी का विषय है। प्रदेश में सेब की खेती रकवा तो बढ़ा है लेकिन उत्पादन में भारी कमी आई है। उत्पादन कम होने का कारण प्रदेश में अभी भी रेड डिलीशियस वैरायटी के पेड़ लगाए गये है, जो पूरी तरह मौसम पर निर्भर है। मौसम जब खराब होता है तो पोलिनेशन सही न होने से सेब के उत्पादन में कमी आ रही है। दूसरा मुख्य कारण न्यूट्रेशन मेनेजमेंट भी अच्छा नहीं है। बागवानों को अब वैज्ञानिक तरीके से सेब की खेती करने की ज़रूरत है। वहीं, दूसरी तरफ सेब को सही मौसम की ज़रूरत है। इस साल प्रदेश में मौसम के बिगड़े मिजाज़ के चलते सेब का उत्पादन प्रभावित होगा। मई के महीने में उपरी इलाकों में बर्फ़बारी हो रही है जो सेब की फसल के लिए अच्छे संकेत नहीं है। अब सेब में नयी नई किस्में आ चुकी है जिनसे 3 से 4000 फीट पर अच्छा सेब उत्पादन हो रहा है।
वहीं, फ्रूट ग्रोअरस एसोसिएशन के अध्यक्ष महेंद्र का कहना है कि प्रदेश में सेब के उत्पादन में कमी होने का मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन है। वहीं, दूसरा कारण कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग भी है, जिसकी वजह से पोलिनेटर और पोलिनेशन में कमी आई है। बागवानों द्वारा जंगलों में आग लगाना भी एक प्रमुख कारण है, जिसके चलते जंगली मक्खियां व जंगली तितलियां अब बागों में नहीं आती है, इससे सेब का उत्पादन प्रभावित हुआ है। सेब के ट्रेडिशनल पेड़ के लिए 1200 से 140 घंटे चिलिंग हावर्स चाहिए होते है, जिसमें 60 डिग्री से कम तापमान होना चाहिए। लेकिन अब चिलिंग हावर्स उतने नहीं मिल पा रहे हैं, जिसके चलते सेब का उत्पादन कम हो रहा है। अब सेब 6000 फीट से ज्यादा की ऊँचाई पर ही हो रहा है, जोकि पहले निचले इलाकों में भी हुआ करता था।
उपनिदेश उद्यान विभाग कुल्लू बीएम चौहान के अनुसार उत्पादन कम होने का कारण मौसम में आया बदलाव और प्रदेश के बगीचों के सेब की पुरानी किस्म है। रॉयल सेब की वैरायटी उपरी इलाकों की तरफ जा रही है। सर्दियों में बर्फ पर्याप्त मात्रा में नहीं पड़ रही है। मौसम में बदलाव के चलते सेब के पौधों को चिलिंग हावर्स नहीं मिल पाए है। सेब के पेड़ अब काफी पुराने हो चुके हैं, अब बागवान इन्हें उखाड़ कर नए पेड़ भी लगा रहे है। अब निचले इलाकों में सेब की जगह अन्य फलों के पेड़ लगा रहे है। अगर भविष्य में जलवायु में इस तरह के परिवतर्न होते रहे तो यह खासकर बागवानी के लिए अच्छे संकेत नहीं होंगे।
हिमाचल में करीब 10 लाख परिवार खेती से जुड़े हुए हैं, इनमें से 2 लाख परिवार ऐसे हैं जो सेब की खेती करते हैं। राज्य की जीडीपी में भी इसका 13 फीसदी से ज्यादा का योगदान रहता है। ऐसे में सेब का घटता उत्पादन बागवानों और राज्य सरकार दोनों के लिए अच्छे संकेत नहीं दे रहा है। बहरहाल सेब उत्पादकों और विशेषज्ञों का मानना है कि अब प्रदेश के बागवानों को सेब की पुरानी किस्मों के पेड़ों के स्थान पर नई किस्म के पेड़ लगाने शुरू करने चाहिए जिन पर मौसम का खासा प्रभाव नहीं पड़ता है। ऐसे में प्रदेश में सेब के उत्पादन को बल मिलेगा।
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