सूखे के कारण हिमाचल की चेरी की गुणवत्ता हो सकती है प्रभावित

#खबर अभी अभी सोलन ब्यूरो*

28 फरवरी 2023

बगीचों में नमी न होने के कारण चेरी उत्पादकों को इस साल उत्पादन प्रभावित होने का डर सता रहा है। सूखे के कारण हिमाचल की चेरी की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है। प्रदेश में सालाना 300 से 350 मीट्रिक टन चेरी का उत्पादन होता है। इस साल सर्दियों में पर्याप्त बारिश और बर्फबारी न होने से सूखे के कारण 25 से 50 मीट्रिक टन तक चेरी उत्पादन घट सकता है। शिमला जिले के नारकंडा के चेरी उत्पादक अजय कैंथला ने कहा कि इतना सूखा पहले कभी नहीं देखा। तेज धूप से तापमान में समय से पहले बढ़ोतरी हो गई है। मार्च सूखा गया तो फ्लावरिंग सही नहीं होगी। पॉलीनेशन न होने से सेटिंग प्रभावित होगी, जिससे उत्पादन घटने का डर है। चेरी का आकार छोटा रह सकता है, फल में जूस भी कम रहेगा। फ्रूट ग्रोवर कोऑपरेटिव मार्केटिंग सोसायटी जरोल के सदस्य शमशेर ठाकुर ने कहा कि सूखे के कारण तापमान बढ़ने से गुठलीदार फलों में समय से पहले फ्लावरिंग हो गई है। चेरी में भी जल्दी फ्लावरिंग हुई तो फसल प्रभावित होगी।

चेरी को आकार और चमक के नाम पर ही दाम मिलते हैं। इस बार गुणवत्ता प्रभावित होने से नुकसान का अंदेशा है। प्रदेश में शिमला जिले के अलावा कुल्लू, मंडी, चंबा, किन्नौर और लाहौल-स्पीति जिलों में चेरी पैदा होती है। प्रदेश में सेब के साथ चेरी उत्पादन बागवानों की आर्थिकी में अहम भूमिका निभा रहा है। शिमला जिले की चेरी हवाई मार्ग से महाराष्ट्र और गुजरात तक भेजी जाती है। इसके अलावा रिलायंस और बिग बास्केट जैसी बड़ी कंपनियां भी चेरी की खरीद करती हैं। शिमला जिले में नारकंडा, कोटगढ़, बागी, मतियाना, कुमारसेन और थानाधार चेरी की पैदावार के सबसे बड़े केंद्र हैं। सेब की तुलना में चेरी को काफी अधिक कीमत मिलती है। चेरी 150 से 350 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बिकती है। बागवानी विभाग के संयुक्त निदेशक डॉ. डीआर शर्मा ने बताया की बारिश न होने के कारण बगीचों में नमी की मात्रा कम है। सूखे की स्थिति अगर लंबी चलती है तो चेरी की फसल को नुकसान पहुंच सकता है।

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