कुल्लू साहित्य उत्सव-2026 आरंभ, अनूप सेठी थे मुख्यातिथि, रतन चंद ने की अध्यक्षता

कुल्लू,
हिमतरु प्रकाशन समिति, जिला प्रशासन तथा भाषा संस्कृति विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कुल्लू साहित्य उत्सव-2026 का शुभारंभ आज बहुउद्देश्य भवन, ढालपुर में हो गया है, जिसमें देश के प्रतिष्ठित कवि-साहित्यकार अनूप सेठी ने बतौर मुख्य-अतिथि शिरकत की जबकी चम्बा से संबद्ध पर्यावरण प्रेमी नतन ने कार्यक्रम के प्रथम सत्र की अध्यक्षता की।
काबिलेगौर है कि कुल्लू साहित्य उत्सव कुल्लू के साहित्य प्रेमी, कवियों, आलोचकों, गद्यकारों, कॉलेज के विद्यार्थियों और प्राध्यापकों का एक ऐसा प्रयास है, जो पहाड़ी क्षेत्र में साहित्य के प्रति रुचि विकसित करने और हिमाचल जैसे दूर-दराज़ के क्षेत्र में नई पहाड़ी पौध में पठन-पाठन में रुचि पैदा करने की सोच पर आधारित है। इस उत्सव का उद्देश्य विद्यार्थियों और साहित्य प्रेमियों को स्त्री, जाति, धर्म, लोकतंत्र और आदिवासी विमर्शों पर एक दृष्टि विकसित करना है।
कुल्लू साहित्य उत्सव के शुभारंभ सत्र पर्यावरण पर आधारित था, जिसमें जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय, दिल्ली के प्रोफेसर डॉ. मिलाप चंद शर्मा तथा चंबा से संबद्ध पर्यावरण प्रेमी रतन चंद मुख्य वक्ता थे। इस सत्र की अध्यक्षता चर्चित साहित्यकार एवं यायावर सैन्नी अशेष ने की।
अपने वक्तव्य में डॉ. मिलाप चंद ने बताया कि हिमालय पूरे विश्व के पर्यावरण को निर्धारित करता है, इसलिए हिमालय के पर्यावरण को संरक्षित करना प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य है। उन्होंने बताया कि हाल ही में हिमाचल प्रदेश में आई प्राकृतिक आपदा को लेकर डॉ. मिलाप ने चिंता जाताते हुए बताया कि चार दशक पूर्व हिमाचल प्रदेश की ज्यादातर आबादी नदी-नालों से दूर थी, लेकिन पैसे कमाने के लोभ में लोगों ने नदी-नालों और हाईवे से साथ आबादी बसाना शुरू किया, जिसके परिणाम आज हमें भुगतने पड़ रहे हैं। उन्होंने चलचित्रों के माध्यम से बताया कि सन् 1874 से पूर्व कुल्लू घाटी में कोई भी गांव या आबादी नदी-नालों के समीप नहीं दिखती थी। डॉ. मिलाप ने बताया कि हिमालय में पानी के स्रोत जल विहीन होने वाले हैं, इसके इस ओर हमे जागरूक होने की अधिक आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भूकंप की दृष्टि से यह सेंसेटिव जोन है। उन्होंने 1905 में हुए कांगड़ा भूकंप का हवाला देते हुए बताया कि उस समय लोगों के एक मंजिला घर हुआ करते थे तो तवाही भयवह थी, लेकिन वर्तमान समय में अगर भूकंप जैसी आपदा आई तो भारी नुकसान होगा। उन्होंने हिमाचलयवासियों को अपने व्यवहार में परिवर्तन लाने तथा उन्होंने स्वीट्ज़रलैंड मॉडल की अपनाने का सुझाव दिया । उन्होंने युवा पीढ़ी को अपने बुजुर्गों से पर्यावरण का ज्ञान हासिल करने की भी अपील की ताकि वे जल जंगल और ज़मीन के महत्व को समझे।
सत्र के दूसरे वक्ता रतन चंद ने चम्बा में हुए हाईड्रो प्रोजक्ट के निर्माण से हुए नुकसान तथा लोगों के संघर्षों को लेकर अपनी बात रखते हुए कहा कि हिमालयी हिंदुस्तान की नब्ज है, इसलिए इससे छेड़छाड़ करना गंभीर परिणाम लाएगी।
प्रथम सत्र की अध्यक्षता करते हुए पर्यावरण प्रेम एवं यायावर सैन्नी अशेष ने उपस्थित सुधीजनों से अपने भीतर के प्रदूषण को खत्म करने की कहते हुए कहा कि प्रत्येक सर्वप्रथम मनुष्य को मानसिक प्रदूषण से मुक्त होना चाहिए तथा बाहरी प्रदूषण स्वतः ही खत्म हो जाएगा। उन्होंने कहा कि विकास और पर्यावरण दोनों एक-दूसरे के पर्याय हैं इसलिए इसके शुद्धतम रूप को समझना आवश्यक है।
कुल्लू साहित्य उत्सव समिति के अध्यक्ष डॉ. निरंजन देव शर्मा ने कार्यक्रम की रूपरेखा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह कार्यक्रम तीन दिन तक चलेगा तथा इसके कविता सत्र, किताब पर चर्चा, सांस्कृति संध्या तथा युवा संवाद प्रमुख हैं। उन्होंने कहा कि इस बार कुल्लू साहित्य उत्सव में विभिन्न प्रकाशन संस्थानों द्वारा बुक स्टाॅल लगाए गए हैं, जिससे पाठकों को बेहतर साहित्य और अन्य विधाओं की पुस्तकें उपलब्ध होगी।
इस दौरान हिमतरु के अध्यक्ष रमेश पठानिया, कुल्लू सहित्य उत्सव समिति के अध्यक्ष डॉ. निरंजन देव शर्मा, हिमतरु के सलाहकार युवराज बौध, सचिव किशन श्रीमान, वरिष्ठ लेखक एवं भाषाविद् डॉ. वरयाम सिंह, रेखा वशिष्ठ, रूपेश्वरी शर्मा, कृष्णा ठाकुर, डॉ. पान सिंह, डॉ. सूरत ठाकुर, प्रभात शर्मा, रमेश मस्ताना, गणेश गनी, मुरारी शर्मा, पवन चौहान, विभिन्न महाविद्यालयों के प्राचार्य/प्राचार्या, प्रोफेसर तथा विद्यार्थियों ने भाग लिया।
कुल्लू ब्यूरो सुशांत शर्मा की रिपोर्ट….

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