350 साल पुरानी परंपरा, 40 दिनों तक चलता जश्न: ऐसी अनोखी है कुल्लू की होली

कुल्लू –
देशभर में होली का त्योहार जहां एक-दो दिन में सिमट जाता है, वहीं कुल्लू की होली अपनी अनूठी परंपराओं, धार्मिक आस्था और 40 दिनों तक चलने वाले उत्सव के लिए पूरे प्रदेश में अलग पहचान रखती है। यहां होली का आगाज बसंत पंचमी से ही हो जाता है और रंगों का यह पर्व करीब डेढ़ महीने तक पूरे क्षेत्र में उल्लास और भक्ति के साथ मनाया जाता है।
कुल्लू की होली भगवान रघुनाथ जी को समर्पित है। परंपरा के अनुसार 1660 ईस्वी में राजा जगत सिंह अयोध्या से भगवान रघुनाथ की मूर्ति कुल्लू लाए थे, तभी से यह उत्सव धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। बसंत पंचमी के दिन रघुनाथ मंदिर कुल्लू में गुलाल अर्पित कर होली की विधिवत शुरुआत की जाती है। इस दौरान होली के विशेष ब्रज अवध की तरफ के पारंपरिक होली के गीत गाए जाते हैं।

40 दिनों तक चलता है उत्सव

यहां होली सिर्फ रंगों का खेल नहीं, बल्कि संस्कृति, भक्ति और लोक परंपराओं का संगम है। यहाँ पर पूरे 40 दिनों तक मंदिरों और गांवों में भजन-कीर्तन, पारंपरिक गीत और धार्मिक आयोजन होते रहते हैं।

बैरागी समुदाय निभाता है खास भूमिका

कुल्लू की होली के दौरान बैरागी समुदाय विशेष भूमिका निभाता है । होलाष्टक के दौरान यह लोग अपने पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ पारंपरिक होली पूरे शहर में गाते हुए जाते हैं और फिर रघुनाथ के मंदिर में जाकर उन्हें भी सुनाते हैं और रंग गुलाल की होली राजा रघुनाथ के छड़ीबरदार महेश्वर सिंह ठाकुर द्वारा इनके ऊपर फेंकी जाती हैं, फिर रंग गुलाल इनके द्वारा भी रघुनाथ जी को अर्पित किया जाता है इस तरह होलाष्टक के 8 दिन तक यह कार्यक्रम चलता है । बैरागी महंत भी इन्हें कहा जाता है ।इनका होली के गीतों के साथ विशेष संबंध है।ऐसा समझो कि इनके बगैर कुल्लू की पारंपरिक होली ,होली नहीं रहेगी। इस दौरान कुल्लू के लोग इन बैरागी महंतों को अपने घरों में सम्मान पूर्वक बुलाते हैं और उनकी होलियां सुनते हैं और काफी पारंपरिक व्यंजन भी इस दौरान बनाए जाते हैं और सभी को खिलाए जाते हैं। होली के दौरान बैरागी समुदाय पारंपरिक होली गीत गाते हुए वाद्य यंत्रों के साथ भगवान रघुनाथ के दरबार में पहुंचता है। यह दृश्य कुल्लू की लोक संस्कृति को जीवंत कर देता है।

राम-भरत मिलन का भावुक दृश्य

ऐतिहासिक ढालपुर दशहरा मैदान में आयोजित ‘राम-भरत मिलन’ कार्यक्रम होली की सबसे खास परंपराओं में से एक है। यह भगवान राम के अयोध्या लौटने और भरत से मिलन का प्रतीक है, जिसे देखने बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं।

‘फाग” की अनोखी रस्म

होली से एक दिन पहले ‘फाग” मनाया जाता है, जिसमें पारंपरिक रूप से अलाव जलाया जाता है। यह कुल्लू के राजमहल के बेहड़ा में मनाया जाता है जिसमें विशेष रूप से कुल्लू के आराध्य रघुनाथ की पालकी भी शिरकत करती है और अलाव के चारों तरफ रघुनाथ जी की पालकी और ध्रुव ऋषि व अन्य देवता भी इसमें शिरकत करते हैं । यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है।
परंपरा और सम्मान का पर्व
कुल्लू की होली में लोग मर्यादाओं का विशेष ध्यान रखते हैं। यहां एक दिन पहले ही रंगों का पर्व मनाया जाता है और बड़े-बुजुर्गों पर रंग डालने से परहेज किया जाता है, जिससे सम्मान और संस्कार की परंपरा बनी रहती है।
कुल्लू की यह अनोखी होली न सिर्फ रंगों का त्योहार है, बल्कि आस्था, परंपरा और लोक संस्कृति का जीवंत उत्सव है, जो इसे पूरे देश में अलग पहचान दिलाता है।

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