हिमाचल में साइबर ठगी का जाल गहराया, रोज 250 तक शिकायतें; यूपीआई और डिजिटल अरेस्ट स्कैम बने बड़ी चुनौती

शिमला: हिमाचल प्रदेश में डिजिटल सेवाओं और ऑनलाइन बैंकिंग के बढ़ते उपयोग के साथ साइबर अपराध भी तेजी से बढ़ रहे हैं। क्रिमिनल इंटेलिजेंस गैजेट (सीआईजी) और साइबर क्राइम विभाग के ताजा आंकड़ों ने प्रदेश में सक्रिय ऑनलाइन ठगी नेटवर्क की गंभीर तस्वीर उजागर की है। अब पुलिस के साइबर क्राइम सेल और राष्ट्रीय हेल्पलाइन 1930 पर प्रतिदिन औसतन 200 से 250 शिकायतें दर्ज हो रही हैं, जबकि पहले यह संख्या 80 से 100 कॉल प्रतिदिन तक सीमित थी।

इस वर्ष के शुरुआती तीन महीनों में ही प्रदेशभर में 5,400 से अधिक साइबर ठगी की शिकायतें दर्ज हुई हैं, जो ऑनलाइन अपराधों के तेजी से बढ़ते खतरे को दर्शाती हैं। सबसे ज्यादा मामले यूपीआई और क्यूआर कोड आधारित ठगी के सामने आए हैं। साइबर अपराधी फर्जी लिंक, नकली भुगतान अनुरोध और गलत क्यूआर कोड स्कैन करवाकर लोगों के बैंक खातों से रकम उड़ा रहे हैं।

इसके अलावा वर्क फ्रॉम होम और पार्ट-टाइम जॉब स्कैम भी तेजी से बढ़े हैं। आंकड़ों के अनुसार करीब 30 प्रतिशत शिकायतें ऐसे मामलों से जुड़ी हैं, जिनमें लोगों को यूट्यूब वीडियो लाइक करने, ऑनलाइन रिव्यू देने या छोटे निवेश पर भारी मुनाफे का लालच देकर लाखों रुपये की ठगी की गई।

निवेश और क्रिप्टोकरेंसी धोखाधड़ी भी पुलिस के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है। ठग नकली ट्रेडिंग ऐप और फर्जी वेबसाइटों के जरिये शेयर बाजार, फॉरेक्स और क्रिप्टो निवेश पर भारी रिटर्न का झांसा देकर लोगों से पैसा जमा करवा रहे हैं।

वहीं डिजिटल अरेस्ट स्कैम पुलिस के लिए नई चुनौती बनकर उभरा है। ठग खुद को सीबीआई, एनसीबी, कस्टम या पुलिस अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं कि उनके नाम पर अवैध पार्सल, मनी लॉन्ड्रिंग या अन्य गंभीर मामला दर्ज है। इसके बाद वीडियो कॉल पर कथित पूछताछ के नाम पर पीड़ितों से रकम ट्रांसफर करवाई जाती है।

गैजेट रिपोर्ट में अवैध लोन एप और कस्टडी स्कैम का भी उल्लेख किया गया है। इन मामलों में त्वरित लोन देने का झांसा देकर लोगों के मोबाइल फोन का निजी डाटा हासिल किया जाता है। बाद में रिश्तेदारों और परिचितों को आपत्तिजनक संदेश भेजने की धमकी देकर ब्लैकमेल किया जाता है।

हालांकि बढ़ते मामलों के बीच राहत की बात यह है कि राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 और पुलिस की त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली कई मामलों में प्रभावी साबित हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार साइबर वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में शुरुआती कुछ घंटे यानी “गोल्डन आवर” सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। यदि पीड़ित तुरंत 1930 हेल्पलाइन या राष्ट्रीय साइबर पोर्टल पर शिकायत दर्ज करता है, तो बैंकों के माध्यम से ठगी की रकम को फ्रीज या ब्लॉक करने की संभावना काफी बढ़ जाती है।

रिपोर्ट में म्यूल अकाउंट्स यानी किराये पर लिए गए बैंक खातों के बड़े नेटवर्क का भी खुलासा हुआ है। ठगी की रकम का बड़ा हिस्सा राज्य से बाहर संचालित लेयर-1 म्यूल अकाउंट्स में ट्रांसफर किया जा रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे लाखों संदिग्ध खातों की पहचान की गई है, जिनका इस्तेमाल अपराधी अपनी असली पहचान छिपाने के लिए कर रहे हैं।

बढ़ते साइबर अपराधों से निपटने के लिए राज्य अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एससीआरबी) और सीआईडी ने कई रणनीतिक निर्देश जारी किए हैं। पुलिस ने लोगों से सतर्क रहने, किसी भी अनजान लिंक पर क्लिक न करने, क्यूआर कोड स्कैन करते समय सावधानी बरतने और किसी भी संदिग्ध कॉल या निवेश प्रस्ताव की तुरंत सूचना देने की अपील की है।

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