
कुल्लू | 14 अगस्त 2026 | खबर अभी-अभी

समाजसेवी एवं पर्यावरणविद् नाथू राम चौहान ने लद्दाख में प्रस्तावित 20 हजार मेगावाट सौर ऊर्जा परियोजना को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि लद्दाख से हरियाणा और राजस्थान तक बिजली पहुंचाने के लिए प्रस्तावित विशाल ट्रांसमिशन लाइन तथा हिमालयी क्षेत्र में पहले से चल रही बड़ी परियोजनाओं का संयुक्त दबाव क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है।
कुल्लू में पत्रकारों से बातचीत के दौरान चौहान ने कहा कि इस तरह की परियोजनाओं को मंजूरी देने से पहले हिमालय की वहन क्षमता (Carrying Capacity) का वैज्ञानिक आकलन किया जाना जरूरी है। उन्होंने आशंका जताई कि बड़े पैमाने पर निर्माण और ट्रांसमिशन नेटवर्क के लिए हजारों किसानों की भूमि प्रभावित हो सकती है।
प्राकृतिक आपदाओं के बीच बढ़ता परियोजनाओं का दबाव
नाथू राम चौहान के अनुसार, कीरतपुर-मंडी-मनाली से लद्दाख तक का हिमालयी क्षेत्र पहले ही भूस्खलन, बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं की चुनौती का सामना कर रहा है। ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में पर्यावरणीय और भौगोलिक परिस्थितियों का व्यापक अध्ययन किए बिना बड़ी परियोजनाओं को आगे बढ़ाना उचित नहीं होगा।
उन्होंने बताया कि लद्दाख के पांग क्षेत्र में 20 हजार मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन और वहां से करीब 900 मील दूर हरियाणा-राजस्थान के कैथल ग्रिड तक बिजली पहुंचाने के लिए विशाल ट्रांसमिशन लाइन प्रस्तावित है। इसके साथ ही शिगरी ग्लेशियर के निकट चंद्रा नदी के पानी को सुरंग के माध्यम से ब्यास नदी की ओर मोड़ने जैसी परियोजनाओं को लेकर भी उन्होंने चिंता जताई।
विकास परियोजनाओं का समर्थन, लेकिन पर्यावरणीय संतुलन जरूरी
चौहान ने कहा कि वह बिलासपुर-मनाली-लद्दाख रेल लाइन और सामरिक महत्व वाली सीमा सड़कों के चौड़ीकरण जैसी परियोजनाओं के विरोध में नहीं हैं। हालांकि, उनका कहना है कि मैदानी क्षेत्रों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए हिमालय में बड़े पैमाने पर बिजली परियोजनाएं स्थापित करना पर्यावरणीय दृष्टि से उचित नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि ऐसी परियोजनाओं का सबसे अधिक प्रभाव स्थानीय लोगों, उनकी जमीन और हिमालयी पारिस्थितिकी पर पड़ सकता है।
संचयी प्रभाव का अध्ययन कराने की मांग
पर्यावरणविद् ने हिमालयी क्षेत्रों में प्रस्तावित और निर्माणाधीन बड़े बांधों, सुरंगों तथा ट्रांसमिशन लाइनों के संचयी पर्यावरणीय प्रभाव का व्यापक अध्ययन कराने की मांग की। उनका कहना है कि किसी एक परियोजना के प्रभाव का आकलन पर्याप्त नहीं है, बल्कि क्षेत्र में मौजूद और प्रस्तावित सभी परियोजनाओं के संयुक्त प्रभाव को ध्यान में रखना जरूरी है।
उन्होंने सुझाव दिया कि मैदानी क्षेत्रों में पहले से मौजूद नहरों के ऊपर सोलर पैनल स्थापित कर सौर ऊर्जा का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। उनके मुताबिक, इससे भूमि अधिग्रहण की जरूरत कम होगी, पर्यावरणीय नुकसान घटेगा और लंबी दूरी की ट्रांसमिशन लाइनों पर निर्भरता भी कम की जा सकेगी।
नाथू राम चौहान ने कहा कि हिमालय देश के जल संसाधनों और पर्यावरणीय संतुलन का महत्वपूर्ण आधार है। इसलिए यहां किसी भी बड़ी परियोजना को मंजूरी देने से पहले उसके दीर्घकालिक पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का निष्पक्ष एवं वैज्ञानिक आकलन किया जाना चाहिए।





