हिमालयी परागणकर्ताओं के संरक्षण की दिशा में मनाली में फील्ड वर्कशॉप बम्बलबी की जैव विविधता, बदलते पर्यावरणीय खतरों और संरक्षण तकनीकों पर छात्रों को मिला व्यावहारिक प्रशिक्षण

19/06/2026
KHABAR ABHI ABHI
KULLU
हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र में परागणकर्ताओं की अहम भूमिका और उनके संरक्षण की बढ़ती जरूरत को रेखांकित करते हुए भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) के मरु क्षेत्रीय केंद्र (DRC), जोधपुर ने जवाहरलाल नेहरू गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज (JLNGC), हरीपुर, मनाली के सहयोग से हिमालयी जंगली परागणकर्ता संरक्षण पर विशेष फील्ड वर्कशॉप का आयोजन किया।
कार्यशाला में कॉलेज के प्राणी विज्ञान और वनस्पति विज्ञान विभागों के विद्यार्थियों एवं संकाय सदस्यों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम का मुख्य फोकस हिमालयी जंगली परागणकर्ताओं, विशेष रूप से बम्बलबी (भौंरों) की पारिस्थितिकी, विविधता, वितरण और संरक्षण पर रहा। प्रतिभागियों को कक्षा आधारित जानकारी के साथ-साथ वास्तविक फील्ड परिस्थितियों में वैज्ञानिक तकनीकों का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया।
जलवायु परिवर्तन और आवास क्षरण बना बड़ा खतरा
कार्यशाला में विशेषज्ञों ने बताया कि हिमालयी बम्बलबी न केवल प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, बल्कि कृषि और खाद्य उत्पादन के लिए भी अत्यंत उपयोगी परागणकर्ता हैं। जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आवासों का क्षरण और जैव विविधता में गिरावट इनके अस्तित्व के सामने गंभीर चुनौतियां पैदा कर रहे हैं।
विद्यार्थियों को बम्बलबी की विविधता एवं वितरण के वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण, आवास विशेषताओं के आकलन और प्रजातियों की सटीक पहचान की आधुनिक तकनीकों से परिचित कराया गया। इसके साथ ही डीएनए रेफरेंस लाइब्रेरी विकसित करने की प्रक्रिया और उसके वैज्ञानिक महत्व की जानकारी भी दी गई।
शोध परियोजना के तहत हुआ आयोजन
यह फील्ड वर्कशॉप राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन (NMHS) द्वारा समर्थित अनुसंधान परियोजना के अंतर्गत आयोजित की गई। परियोजना का उद्देश्य हिमालयी जंगली परागणकर्ताओं के संरक्षण एवं प्रबंधन के लिए पारिस्थितिकी तंत्र का आकलन करना तथा हिमालयी बम्बलबी की दीर्घकालिक निगरानी के माध्यम से जैव विविधता संरक्षण को मजबूत करना है।
परियोजना का क्रियान्वयन भारतीय प्राणी सर्वेक्षण, मरु क्षेत्रीय केंद्र, जोधपुर द्वारा किया जा रहा है। परियोजना का नेतृत्व डॉ. आर. एच. रैना, वैज्ञानिक-ई एवं प्रधान अन्वेषक कर रहे हैं। उन्हें ZSI की निदेशक डॉ. धृति बनर्जी का मार्गदर्शन एवं सहयोग प्राप्त है।
छात्रों को सिखाए संरक्षण के वैज्ञानिक तौर-तरीके
फील्ड प्रशिक्षण के दौरान विद्यार्थियों ने परागणकर्ताओं के संरक्षण से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं को करीब से समझा। इनमें बम्बलबी की प्रजातीय विविधता का अध्ययन, उनके आवास की पहचान एवं आकलन, फील्ड में वैज्ञानिक डेटा संग्रह तथा प्रजाति पहचान की आधुनिक विधियां प्रमुख रहीं।
कार्यशाला के माध्यम से विद्यार्थियों को यह भी समझाया गया कि परागणकर्ताओं का संरक्षण केवल वन्यजीव संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि कृषि, खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता से सीधे जुड़ा मुद्दा है।
मिशन LiFE का भी दिया संदेश
कार्यक्रम में मिशन LiFE के तहत पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली अपनाने पर भी जोर दिया गया। प्रतिभागियों को दैनिक जीवन में ऐसी आदतें अपनाने के लिए प्रेरित किया गया, जो पर्यावरण पर दबाव कम करने के साथ-साथ जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में योगदान दें।
कार्यक्रम के समापन पर परागणकर्ताओं की भूमिका और उनके संरक्षण की चुनौतियों को लेकर संवादात्मक चर्चा हुई। विशेषज्ञों और विद्यार्थियों के बीच हुए संवाद ने संरक्षण के प्रति वैज्ञानिक समझ और जिम्मेदारी की भावना को और मजबूत किया।
वैज्ञानिक जागरूकता और संरक्षण प्रतिबद्धता को मिला बल
कार्यक्रम का संचालन डॉ. इशाक मजीद शाह, शोध सहयोगी और डॉ. मुजफ्फर रियाज़ ने डॉ. आर. एच. रैना की देखरेख में किया। आयोजकों ने डॉ. धृति बनर्जी, निदेशक, ZSI तथा डॉ. इंदु शर्मा, प्रभारी अधिकारी, DRC-ZSI के निरंतर मार्गदर्शन के लिए आभार व्यक्त किया।
आयोजन के लिए राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन (NMHS), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार के वित्तीय सहयोग के प्रति भी आभार जताया गया।
वहीं, महाविद्यालय की डॉ. साक्षी राणा, वनस्पति विज्ञान विभाग; प्रो. मोनिका परशीरा, प्राणी विज्ञान विभाग तथा प्राचार्या डॉ. शेफाली के सहयोग को भी आयोजन की सफलता में महत्वपूर्ण बताया गया।
फील्ड वर्कशॉप ने विद्यार्थियों को यह स्पष्ट संदेश दिया कि हिमालयी परागणकर्ताओं का संरक्षण केवल वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज, समुदाय और आने वाली पीढ़ियों के साझा भविष्य से जुड़ा दायित्व है। कार्यक्रम ने वैज्ञानिक जागरूकता, सामुदायिक भागीदारी और संरक्षण की प्रतिबद्धता को मजबूत करने के साथ हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए परागणकर्ताओं की रक्षा की आवश्यकता को प्रमुखता से सामने रखा

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