
हिमाचल : देशभर में थायराइड विकार तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल हो चुके हैं। पहले जहां महिलाओं में थायराइड के अधिक मामले सामने आते थे, वहीं अब पुरुषों में भी इसके गंभीर लक्षण तेजी से बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार लगातार बढ़ता वर्कलोड, मानसिक तनाव, अनियमित दिनचर्या और थकान पुरुषों में थायराइड के मामलों को बढ़ाने का बड़ा कारण बन रहे हैं। हिमाचल प्रदेश में भी पुरुषों में थायराइड के मामलों में बढ़ोतरी देखी जा रही है, हालांकि प्रदेश में इस संबंध में कोई हालिया व्यापक अध्ययन नहीं हुआ है।
अध्ययनों के अनुसार भारत में लगभग हर 10 में से एक व्यक्ति किसी न किसी प्रकार के थायराइड विकार से प्रभावित है। महिलाओं में यह समस्या पुरुषों की तुलना में करीब 10 फीसदी अधिक पाई जाती है। हिमाचल प्रदेश में 31 से 50 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं में थायराइड के अधिक मामले दर्ज किए जा रहे हैं। वहीं गर्भावस्था के दौरान महिलाओं में थायराइड की समस्या बच्चों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर डाल रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब शरीर में थायराइड हार्मोन कम या अधिक बनने लगते हैं तो थायराइड विकार उत्पन्न होते हैं। इसका असर केवल बड़ों में ही नहीं बल्कि बच्चों में भी देखने को मिल रहा है। समय रहते पहचान और उपचार न होने पर बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है।
शरीर के लगभग हर अंग को प्रभावित करता है थायराइड
गले के सामने स्थित छोटी-सी थायराइड ग्रंथि शरीर की ऊर्जा, मेटाबॉलिज्म, शरीर का तापमान, दिल की धड़कन, मानसिक विकास और हार्मोन संतुलन को नियंत्रित करती है। यह ग्रंथि टी3 और टी4 हार्मोन बनाती है, जो शरीर के लगभग हर अंग के कार्य को प्रभावित करते हैं।
थायराइड के प्रमुख लक्षणों में वजन बढ़ना, लगातार थकान और कमजोरी महसूस होना, ठंड अधिक लगना, कब्ज और चेहरे या शरीर में सूजन शामिल हैं।
थायराइड के चार मुख्य प्रकार
विशेषज्ञों के अनुसार थायराइड मुख्य रूप से चार प्रकार का होता है —
हाइपोथायरॉयडिज्म
हाइपरथायरॉयडिज्म
गॉइटर (घेंघा)
थायराइड नोड्यूल
शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. अंकुर धर्माणी और मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. सोनिया ने बताया कि महिला, पुरुष और बच्चों सभी में थायराइड के लक्षण देखने को मिल रहे हैं। समय पर जांच और उपचार से इसके दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है।
2500 में से एक बच्चा जन्मजात थायराइड से प्रभावित
नवजात बच्चों में भी जन्मजात थायराइड के मामले सामने आ रहे हैं। अध्ययनों के अनुसार करीब 2500 में से एक बच्चा जन्मजात थायराइड विकार से प्रभावित पाया जा रहा है। गर्भवती महिलाओं में आयोडीन की कमी और जेनेटिक कारण इसके प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार पहाड़ी क्षेत्रों में आयोडीन की कमी के कारण जोखिम और बढ़ जाता है। यदि जन्मजात हाइपोथायरॉयडिज्म का समय पर इलाज न हो तो बच्चे का मानसिक विकास प्रभावित हो सकता है। इसलिए नवजात शिशुओं की समय पर स्क्रीनिंग बेहद जरूरी मानी जा रही है।





