
नई दिल्ली | वक्फ संशोधन अधिनियम-2025 की वैधता को चुनौती देने वाली 73 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से तीखे सवाल करते हुए मामले की सुनवाई गुरुवार को भी जारी रखने की बात कही। चीफ जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस केवी विश्वनाथन की तीन सदस्यीय पीठ ने वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिमों के मामले को लेकर सरकार से पूछा कि क्या वह मुसलमानों को हिंदू धार्मिक ट्रस्टों का हिस्सा बनने की अनुमति देने को तैयार है? कोर्ट ने सुनवाई के दौरान वक्फ कानून को लेकर कोलकाता में हो रही हिंसा पर चिंता भी जताई। अब इस मामले में अंतरिम आदेश पास करने पर गुरुवार दोपहर दो बजे सुनवाई होगी। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ कानून पर रोक नहीं लगाई है। कोर्ट ने एक आदेश पास करने का प्रस्ताव रखा है। इसमें ‘वक्फ बाय यूजर सहित घोषित वक्फ प्रॉपर्टी को गैर-अधिसूचित नहीं किया जाएगा।
सीजेआई ने कहा कि जो भी संपत्ति वक्फ घोषित की गई है, जो भी संपत्ति उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ घोषित की गई है या न्यायालय द्वारा घोषित की गई है, उसे गैर-अधिसूचित नहीं किया जाएगा। कलेक्टर कार्यवाही जारी रख सकते हैं, लेकिन प्रावधान लागू नहीं होगा। पदेन सदस्य नियुक्त किए जा सकते हैं। उन्हें धर्म की परवाह किए बिना नियुक्त किया जा सकता है, लेकिन अन्य मुस्लिम होने चाहिए। केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव का विरोध किया और सुनवाई की मांग की। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि वक्फ कानून का उद्देश्य केवल संपत्ति का नियमन है, न कि धार्मिक हस्तक्षेप। उन्होंने कहा कि सरकार ट्रस्टी के रूप में कार्य कर सकती है और कलेक्टर को निर्णय लेने का अधिकार दिया गया है, ताकि संपत्ति विवादों का शीघ्र समाधान हो सके।
इससे पहले सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि नया वक्फ कानून संविधान के अनुच्छेद 26 का उल्लंघन करता है, जो धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार देता है। अधिवक्ता कपिल सिब्बल और राजीव धवन ने कोर्ट में तर्क रखा कि वक्फ इस्लाम का आवश्यक और अभिन्न हिस्सा है और सरकार इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती। सिब्बल ने कहा कि यह अधिनियम न केवल धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला है, बल्कि मुस्लिमों की निजी संपत्तियों पर सरकार का ‘टेकओवर’ है। उन्होंने कहा कि कानून की कई धाराएं विशेषकर धारा 3(आर), 3(ए)(2), 3(सी), 3(ई), 9, 14 और 36 असंवैधानिक हैं और इससे मुसलमानों को धार्मिक, सामाजिक और संपत्ति से जुड़े अधिकारों से वंचित किया जा रहा है।





