
हिमालयी क्षेत्रों में पाई जाने वाली गुच्छी मशरूम इस वर्ष मौसम की बेरुखी के कारण गायब हो गई है। जनवरी और फरवरी में पर्याप्त बारिश और बर्फबारी न होने से जंगलों की मिट्टी में नमी कम हो गई है, जिसका सीधा असर गुच्छी के उत्पादन पर पड़ा है।
हर वर्ष मार्च महीने में शिमला के बाजारों में गुच्छी पहुंचना शुरू हो जाती थी, लेकिन इस बार गुच्छी ढूंढे नहीं मिल रही है। आम तौर पर हिमालयी इलाकों में गुच्छी मशरूम प्राकृतिक रूप से जंगलों में उगती है। स्थानीय लोग जनवरी से मार्च के बीच जंगलों में जाकर इसे ढूंढते हैं और फिर बाजारों में बेचते हैं। यह सबसे महंगी सब्जी गुच्छी मशरूम है। बाजार में इसकी कीमत छह हजार से 12 हजार रुपये प्रतिकिलो तक होती है, इसलिए यह पहाड़ी क्षेत्रों के लोगों के लिए आय का महत्वपूर्ण स्रोत भी है। लेकिन इस साल मौसम में आए बदलाव ने लोगों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।
जनेड़ घाट के सुरेंद्र कुमार ने बताया कि ऐसी स्थिति जिला शिमला में 20 वर्षो में एक या दो बार ही देखने को मिली है। वहीं पिछले करीब पांच से छह वर्षों में पहली बार हुआ है कि जंगलों से गुच्छी बिल्कुल गायब है। वहीं कोटी क्षेत्र के निवासी राम प्रकाश का कहना है कि हर साल इस समय तक ग्रामीण जंगलों में गुच्छी ढूंढने के लिए निकल जाते थे।
इस बार भी वह एक-दो बार उन जगहों पर गए, जहां हर वर्ष गुच्छी मिलती है, लेकिन वहां इस बार कुछ भी नहीं मिला। इसलिए मायूस होकर लौटना पड़ा। उनका कहना है कि बारिश और बर्फबारी न होने के कारण जमीन में नमी नहीं है। इस वजह से गुच्छी का उगना मुश्किल हो गया है।
गुच्छी मशरूम के फायदे
गुच्छी मशरूम में प्रोटीन, एंटीऑक्सीडेंट्स, विटामिन और मिनरल्स भरपूर मात्रा में होते हैं। भारत में ये मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू और कश्मीर के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है। स्थानीय लोगों का मानना है कि बिजली गिरने से ये गुच्छी उगती है।
सैंपल के तौर पर ही दुकान में दिख रही है पुरानी गुच्छी
राजधानी के गंज बाजार में हर वर्ष गुच्छी का लाखों रुपये का कारोबार होता है, लेकिन इस बार गुच्छी बाजार में देखने को भी नहीं मिल रही। गंज बाजार के आढ़ती भीम सिंह ने बताया कि मार्च में रामपुर, चौपाल और करसोग से लोग गुच्छी लेकर पहुंचना शुरू हो जाते थे, लेकिन इस बार फसल उगी ही नहीं है। बाजार से दिल्ली को गुच्छी की सप्लाई भेजी जाती थी। विदेशों से भी इसकी मांग आती है। आढ़ती जगदीश कुमार ने बताया कि जंगलों में नमी खत्म होने से गुच्छी उग ही नहीं पाई है। दुकान में वर्षों पुरानी गुच्छी केवल सैंपल के तौर पर देखने के लिए रखी है।





