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शिमला। 3 July 2026,
हिमाचल प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक, कृषि और हस्तशिल्प विरासत को एक और बड़ी पहचान मिली है। प्रदेश के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और कृषि महत्व वाले आठ पारंपरिक उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication-GI) टैग प्राप्त हुआ है। इसके साथ ही हिमाचल प्रदेश के जीआई टैग प्राप्त उत्पादों की संख्या बढ़कर 17 हो गई है।
जिन आठ नए उत्पादों को जीआई पंजीकरण मिला है, उनमें **स्पीति का सी-बकथॉर्न (छरमा), चंबा जिले की सलूणी सफेद मक्का, चंबा मेटल आर्ट, सिरमौरी लोइया, किन्नौरी टोपी, मंडी की पारंपरिक सेपूबड़ी, किन्नौरी सेब और किन्नौरी आभूषण** शामिल हैं। इन उत्पादों का पंजीकरण हिमाचल प्रदेश विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद (हिमकोस्ट) के माध्यम से कराया गया है।
ये सभी उत्पाद प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों की पारंपरिक कला, शिल्प, कृषि और सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करते हैं। जीआई टैग मिलने से इनकी मौलिकता और विशिष्ट पहचान को कानूनी संरक्षण मिलेगा, जिससे नकली उत्पादों पर रोक लगाने में मदद मिलेगी और असली उत्पादों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजार में अलग पहचान मिलेगी।
मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने इस उपलब्धि पर प्रदेशवासियों को बधाई देते हुए कहा कि यह सफलता राज्य सरकार द्वारा पिछले साढ़े तीन वर्षों में पारंपरिक विरासत के संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार के लिए किए गए निरंतर प्रयासों का परिणाम है। उन्होंने कहा कि जीआई टैग मिलने से इन उत्पादों की बाजार में मांग और मूल्य दोनों बढ़ेंगे, जिससे कारीगरों, किसानों और स्थानीय उत्पादकों की आय में वृद्धि होगी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार स्थानीय उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है। जीआई टैग न केवल प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करेगा, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी पैदा करेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करेगा। उन्होंने विश्वास जताया कि इससे हिमाचल के पारंपरिक उत्पादों की देश-विदेश में मांग बढ़ेगी और स्थानीय समुदायों को इसका सीधा लाभ मिलेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि जीआई टैग किसी भी उत्पाद की गुणवत्ता, विशिष्टता और उसके भौगोलिक क्षेत्र से जुड़े पारंपरिक ज्ञान की आधिकारिक पहचान होता है। इससे उत्पादों की ब्रांड वैल्यू बढ़ती है और स्थानीय कारीगरों व किसानों को बेहतर बाजार उपलब्ध होता है।





