आत्मनिर्भर भारत की खोज’ पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आईआईएएस में शुभारंभ

24 सितंबर | खबर अभी अभी | शिमला

अतीत के अनुभवों, वर्तमान की चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं पर दो दिवसीय अकादमिक विमर्श

शिमला। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (आईआईएएस), राष्ट्रपति निवास, शिमला में ‘The Quest for Atmanirbhar Bharat: From the Past, Through the Present, to the Future’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। 24 और 25 सितंबर को आयोजित इस संगोष्ठी में आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को भारतीय ज्ञान परंपरा, स्वराज, स्वदेशी, एकात्म मानव दर्शन और विकसित भारत के लक्ष्य के व्यापक संदर्भ में अकादमिक विमर्श का विषय बनाया गया है।

संगोष्ठी का उद्घाटन सत्र राष्ट्रीय गीत के साथ शुरू हुआ। इसके बाद संगोष्ठी की संयोजक एवं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के स्पेशल सेंटर फॉर नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज (SCNSS) की सहायक प्रोफेसर डॉ. आयुषी केतकर ने स्वागत एवं विषय-परिचय प्रस्तुत किया। उन्होंने संगोष्ठी के उद्देश्य, अकादमिक संदर्भ और अंतर्विषयक विमर्श की रूपरेखा प्रस्तुत की।

उद्घाटन सत्र में भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के निदेशक प्रो. हिमांशु कुमार चतुर्वेदी ने अध्यक्षीय संबोधन दिया। उन्होंने आत्मनिर्भरता को भारतीय ज्ञान, चिंतन और विकास-दृष्टि के व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। सत्र के अंत में आईआईएएस के पुस्तकालयाध्यक्ष एवं एआरओ डॉ. राजीव कुमार मिश्रा ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

संगोष्ठी में आत्मनिर्भर भारत को केवल आर्थिक अथवा तकनीकी आत्मनिर्भरता तक सीमित न रखते हुए भारत की बौद्धिक एवं सांस्कृतिक परंपरा, विकास-दृष्टि और समकालीन वैश्विक परिस्थितियों के संदर्भ में समझने पर विमर्श किया जा रहा है। संगोष्ठी का केंद्रीय विमर्श स्वराज से स्वदेशी तथा औपनिवेशिक काल से आत्मनिर्भर भारत@2047 तक की यात्रा को विभिन्न अंतर्विषयक दृष्टिकोणों से देखने पर केंद्रित है।

अवधारणा-पत्र के अनुसार, एकात्म मानव दर्शन को वैश्वीकरण के बाद की बदलती विश्व-व्यवस्था के संदर्भ में देखने तथा विकास के भारतीय दृष्टिकोण पर विचार करने का प्रयास भी संगोष्ठी का हिस्सा है। इसके अंतर्गत प्रकृति और संस्कृति, राष्ट्रीय चेतना, सतत एवं समावेशी विकास तथा समकालीन चुनौतियों के संदर्भ में भारतीय दृष्टिकोण की संभावनाओं पर चर्चा की जा रही है।

विभिन्न विषयों पर हुआ अकादमिक विमर्श

संगोष्ठी के प्रथम अकादमिक सत्र में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा : विकसित भारत की आधारभूमि’, ‘एकात्म मानववाद, शिक्षा और आत्मनिर्भर भारत’ तथा ‘चिति के नेतृत्व में आत्मनिर्भर भारत’ जैसे विषयों पर प्रस्तुतियां हुईं।

इसके बाद आयोजित सत्र में एकात्म मानव दर्शन, समग्र मानववाद, भारतीय संविधान की मूल भावना तथा आत्मनिर्भरता से वसुधैव कुटुम्बकम् तक जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे।

दो दिवसीय संगोष्ठी में आत्मनिर्भरता को वर्तमान समय की आर्थिक, सामाजिक, तकनीकी और वैश्विक चुनौतियों के साथ जोड़कर देखने का प्रयास किया जा रहा है। विकसित भारत और आत्मनिर्भरता, एकात्म मानव दर्शन, तकनीकी प्रगति, शिक्षा एवं स्वास्थ्य, विकास में असमानताएं, महिला-नेतृत्व वाला विकास तथा स्वराज-स्वदेशी-आत्मनिर्भर भारत के अंतर्संबंध सहित कई विषयों को विस्तृत अकादमिक विमर्श के लिए निर्धारित किया गया है।

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान की यह संगोष्ठी समकालीन राष्ट्रीय एवं वैश्विक प्रश्नों को विभिन्न ज्ञान-विषयों और दृष्टिकोणों के माध्यम से समझने के अकादमिक प्रयास का हिस्सा है। आयोजन के दौरान शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों और विषय विशेषज्ञों द्वारा आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा के ऐतिहासिक, दार्शनिक, सामाजिक, आर्थिक और समकालीन आयामों पर विचार-विमर्श किया जा रहा है।

25 सितंबर को होगा समापन सत्र

संगोष्ठी का समापन सत्र 25 सितंबर 2026 को आयोजित होगा, जिसकी अध्यक्षता हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल कविंदर गुप्ता करेंगे। समापन सत्र में विशिष्ट अतिथियों का अभिनंदन, चार पुस्तकों का विमोचन, संगोष्ठी की रिपोर्ट प्रस्तुति तथा अकादमिक संबोधन निर्धारित हैं।

एशियाटिक सोसाइटी, मुंबई के अध्यक्ष डॉ. विनय सहस्रबुद्धे ऑनलाइन माध्यम से वैलिडिक्टरी संबोधन देंगे। इसके बाद भारत प्रकाशन, दिल्ली के संपादक एवं आयोजक प्रफुल्ल केतकर अपने विचार रखेंगे। कार्यक्रम के अंत में हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल कविंदर गुप्ता अध्यक्षीय संबोधन देंगे।

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