
17 सितंबर 2026 | खबर अभी अभी | शिमला

शिमला। हिमाचल प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानियां ने दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन स्थित दक्षिण अफ्रीकी संसद में आयोजित 69वें राष्ट्रमंडल संसदीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून बनाना विधायिका का अंतिम उद्देश्य नहीं है। किसी कानून की वास्तविक सफलता उसके लागू होने के बाद समाज और जनता के जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव, उद्देश्यों की पूर्ति और क्रियान्वयन के दौरान सामने आने वाली चुनौतियों से तय होती है।
पठानियां सम्मेलन में “विधायी समीक्षा के बाद: संसद को जनता से जोड़ना” विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे। इसी विषय पर उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना और हरियाणा विधानसभा अध्यक्ष हरविंद्र कल्याण ने भी अपने विचार रखे।
कानूनों की समीक्षा से सामने आती हैं कमियां
पठानियां ने कहा कि विधि निर्माण के बाद समीक्षा का उद्देश्य कानून लागू होने के बाद उसके परिणामों का व्यवस्थित मूल्यांकन करना है। इसके तहत यह देखा जा सकता है कि कानून अपने मूल उद्देश्यों के अनुरूप काम कर रहा है या नहीं, उसके क्रियान्वयन में क्या बाधाएं हैं, प्रशासनिक संस्थाओं के पास पर्याप्त संसाधन हैं या नहीं और नागरिकों पर उसका क्या प्रभाव पड़ा है।
उन्होंने कहा कि समीक्षा से उन कमियों की पहचान संभव होती है, जो कानून बनाते समय स्पष्ट नहीं हो पातीं।
संसदीय समितियों की भूमिका महत्वपूर्ण
विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि संसदीय समितियां कानूनों की समीक्षा की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। समितियां संबंधित मंत्रालयों से आंकड़े और रिपोर्ट मांगने के साथ विशेषज्ञों, प्रशासनिक अधिकारियों, नागरिक समाज, उद्योग जगत और प्रभावित नागरिकों के विचार भी सुन सकती हैं।
उन्होंने कहा कि इससे कानून की समीक्षा केवल सरकारी दस्तावेजों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वास्तविक अनुभवों और जमीनी परिस्थितियों पर भी आधारित होगी।
जनता की भागीदारी को बनाया जाए प्रभावी
पठानियां ने कहा कि नागरिकों को कानूनों के क्रियान्वयन से जुड़ी समस्याओं और सुझावों को संसदीय समितियों तक पहुंचाने के सरल माध्यम उपलब्ध होने चाहिए। श्रम, शिक्षा, पर्यावरण, सामाजिक सुरक्षा, उपभोक्ता संरक्षण और डिजिटल शासन जैसे क्षेत्रों से जुड़े कानूनों की समीक्षा में नागरिकों के अनुभव महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
उन्होंने सार्वजनिक परामर्श को समीक्षा प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। संसदीय समितियां लिखित सुझाव आमंत्रित करने, सार्वजनिक सुनवाई आयोजित करने और जरूरत के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों का दौरा करने जैसी व्यवस्थाएं अपना सकती हैं।
कानून का वास्तविक परीक्षण उसके परिणामों से
पठानियां ने कहा कि विधि निर्माण के बाद समीक्षा लोकतांत्रिक विधायी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कानून बनाना प्रक्रिया का अंत नहीं, बल्कि उसके प्रभावों के मूल्यांकन की शुरुआत भी है। किसी कानून की सफलता का वास्तविक परीक्षण उसके क्रियान्वयन और जनता के जीवन में दिखाई देने वाले परिणामों से होता है।
उन्होंने कहा कि जनता से निरंतर संवाद, विधायिका की सक्रिय निगरानी, संसदीय समितियों की प्रभावी भूमिका, विश्वसनीय आंकड़ों और आधुनिक तकनीक के उपयोग से विधि निर्माण के बाद समीक्षा की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि सशक्त लोकतंत्र में जनता केवल कानूनों की प्राप्तकर्ता नहीं, बल्कि उनके प्रभाव के मूल्यांकन और सुधार की प्रक्रिया में भी सहभागी हो। विधि निर्माण के बाद समीक्षा और जनता से जुड़ाव विधायी व्यवस्था को अधिक उत्तरदायी, पारदर्शी और नागरिक-केंद्रित बनाने में योगदान दे सकते हैं।





