
17 सितंबर 2026 | खबर अभी अभी | पाक्योंग, सिक्किम

पाक्योंग। हिमाचल प्रदेश के मीडिया प्रतिनिधिमंडल ने सिक्किम के पाक्योंग जिले के दक्षिणी रेगु गांव का दौरा कर बड़ी इलायची की खेती, उत्पादन, वैज्ञानिक तकनीक और किसानों को मिल रही सहायता की जानकारी हासिल की। प्रतिनिधिमंडल ने किसानों से बातचीत कर फसल से जुड़ी जमीनी चुनौतियों, उत्पादन और आजीविका के अवसरों को भी समझा।
दौरे के दौरान स्पाइसेज बोर्ड, सिक्किम के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. टीकेन्द्र डेका ने प्रतिनिधिमंडल को बड़ी इलायची की वैज्ञानिक खेती, उपयुक्त जलवायु, उत्पादन प्रक्रिया और किसानों के सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। फेलो साइंटिस्ट नीलम ने किसानों को उपलब्ध सहायता तथा पुनःरोपण से जुड़ी गतिविधियों की जानकारी साझा की।
बड़ी इलायची सिक्किम की प्रमुख नकदी फसलों में शामिल है। कृषि विभाग, सिक्किम के अनुसार, इसका वैज्ञानिक नाम Amomum subulatum Roxb. है और यह Zingiberaceae परिवार से संबंधित है। इसकी खेती मुख्य रूप से उप-हिमालयी सिक्किम और पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग क्षेत्र में होती है। इसके अलावा उत्तराखंड और पूर्वोत्तर के कुछ पर्वतीय राज्यों के साथ नेपाल और भूटान में भी इसकी खेती की जाती है।
ठंडी और आर्द्र जलवायु में बेहतर उत्पादन
वैज्ञानिकों के अनुसार बड़ी इलायची की खेती के लिए ठंडी और आर्द्र जलवायु अनुकूल होती है। सामान्यतः 600 से 2000 मीटर की ऊंचाई तथा लगभग 4 से 25 डिग्री सेल्सियस तापमान को इसके लिए उपयुक्त माना जाता है। बेहतर उत्पादकता के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप उपयुक्त किस्म का चयन महत्वपूर्ण है। प्रतिनिधिमंडल को बड़ी इलायची की विभिन्न किस्मों और प्रवर्धन की अलग-अलग विधियों के बारे में भी जानकारी दी गई।
डॉ. डेका ने बताया कि बड़ी इलायची की रोपाई के लिए सामान्यतः अप्रैल से जून का समय उपयुक्त रहता है और पौधे करीब दो वर्ष में फल देना शुरू कर सकते हैं। पौधे के पुष्पक्रम में सामान्यतः 30 से 40 फूल होते हैं। फूलों के परागण में भंवरे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। फल कैप्सूल के रूप में विकसित होता है, जिसमें अनेक बीज होते हैं।
रोगों से बचाव और जैविक खेती पर जोर
प्रतिनिधिमंडल को बड़ी इलायची की फसल में होने वाले रोगों, विशेषकर ब्लाइट जैसे फंगल संक्रमण की रोकथाम के उपायों की जानकारी भी दी गई। वैज्ञानिकों ने जैविक खेती की परिस्थितियों में किसानों द्वारा अपनाए जाने वाले निवारक उपायों और फसल प्रबंधन पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि बड़ी इलायची की जड़ें अपेक्षाकृत कम गहराई तक जाती हैं, इसलिए पौधों के स्वस्थ विकास के लिए उचित प्रबंधन आवश्यक है।
डॉ. डेका के अनुसार सिक्किम में बड़ी इलायची का उत्पादन लगभग 5,500 मीट्रिक टन के स्तर पर है और खेती के नए क्षेत्रों को भी इसके दायरे में लाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि सिक्किम के साथ अरुणाचल प्रदेश भी बड़े इलायची उत्पादक क्षेत्र के रूप में उभर रहा है। क्षेत्रीय स्तर पर खेती के विस्तार और बाजार में प्रतिस्पर्धा से जुड़े पहलुओं पर भी काम किया जा रहा है।
किसानों से संवाद, क्योरिंग प्रक्रिया की ली जानकारी
मीडिया प्रतिनिधिमंडल ने किसानों से बातचीत कर बड़ी इलायची की खेती से जुड़ी जमीनी चुनौतियों, उत्पादन और आजीविका के अवसरों को समझा। प्रतिनिधिमंडल ने कटाई के बाद बड़ी इलायची की पारंपरिक सुखाने और क्योरिंग प्रक्रिया का भी अवलोकन किया। इस प्रक्रिया में फसल को नियंत्रित ताप के माध्यम से सुखाकर बाजार के लिए तैयार किया जाता है।
दौरे के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने सिक्किम में मसाला फसलों के वैज्ञानिक विकास, किसानों को दी जा रही तकनीकी सहायता तथा बड़ी इलायची की खेती को अधिक उत्पादक और टिकाऊ बनाने के प्रयासों की जानकारी प्राप्त की। दौरे का उद्देश्य सिक्किम में कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की आजीविका से जुड़े विकास कार्यों का प्रत्यक्ष अनुभव हासिल करना रहा।





