कुल्लू दशहरा में ‘नज़राना’ नहीं, ‘देव-भेंट’ शब्द को सम्मान देने का आग्रह

5 अक्टूबर, 2026 | खबर अभी-अभी | कुल्लू

कुल्लू की समृद्ध देव-परंपरा, लोक आस्था और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को लेकर देव संस्कृति शोध संस्थान ने कुल्लू दशहरा में देवताओं को अर्पित की जाने वाली राशि अथवा उपहार के लिए प्रचलित ‘नज़राना’ शब्द के स्थान पर ‘देव-भेंट’ शब्द के प्रयोग का विनम्र आग्रह किया है।

संस्थान का कहना है कि कुल्लू की देव संस्कृति में देवता को अर्पित की जाने वाली वस्तु या राशि केवल आर्थिक लेन-देन नहीं, बल्कि श्रद्धा, सम्मान, कृतज्ञता और समर्पण की अभिव्यक्ति है। ऐसे में इससे जुड़ी शब्दावली भी इसी भावभूमि को व्यक्त करने वाली होनी चाहिए।

संस्थान ने स्पष्ट किया कि यह किसी प्रचलित शब्द या भाषा का विरोध नहीं है। ‘नज़राना’ शब्द ऐतिहासिक रूप से भेंट और सम्मान के अर्थ में प्रयुक्त होता रहा है, लेकिन कुल्लू की विशिष्ट देव-परंपरा के संदर्भ में ‘देव-भेंट’ शब्द अधिक आत्मीय और श्रद्धापूर्ण भाव व्यक्त करता है।

संस्थान के अनुसार, कुल्लू दशहरा महज एक उत्सव नहीं, बल्कि हिमालय की जीवंत देव-संस्कृति का विराट मंच है। इसमें शामिल देवता, देव रथ, देवलू, बजंतरी और श्रद्धालु सदियों पुरानी लोक परंपरा के वाहक हैं। ऐसे में इस परंपरा से जुड़े शब्दों में भी स्थानीय सांस्कृतिक चेतना और सम्मान की झलक होनी चाहिए।

देव संस्कृति शोध संस्थान ने आग्रह किया कि ‘नज़राना’ के स्थान पर ‘देव-भेंट’ शब्द को सम्मानपूर्वक अपनाने पर विचार किया जाए। संस्थान का कहना है कि यह किसी शब्द को हटाने की पहल नहीं, बल्कि अपनी देव-संस्कृति की शब्दावली को सम्मान देने का प्रयास है।

संस्थान ने कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि किसी समाज की स्मृति, आस्था और सांस्कृतिक पहचान को भी संजोए रखती है। इसलिए देव परंपरा से जुड़े सम्मानपूर्ण शब्दों का संरक्षण भी सांस्कृतिक संरक्षण का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

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