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मंडी:
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी के वैज्ञानिकों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित ‘बायोफास्टनेट’ (BioFastNet) नामक उन्नत मॉडल विकसित किया है। यह तकनीक भविष्य में कैंसर समेत कई गंभीर बीमारियों की पहचान को पहले से अधिक तेज, सटीक और प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
यह मॉडल एफटीआईआर (Fourier Transform Infrared-FTIR) जांच से प्राप्त जटिल जैव-चिकित्सीय आंकड़ों का स्वतः विश्लेषण कर डॉक्टरों को बीमारी के शुरुआती संकेत समझने और उपचार संबंधी निर्णय लेने में मदद करेगा। फिलहाल यह तकनीक शोध के अंतिम चरण में है।
विशेषज्ञों पर निर्भरता होगी कम
वर्तमान में एफटीआईआर तकनीक का उपयोग अस्पतालों, पैथोलॉजी लैब, माइक्रोबायोलॉजी और जैव-चिकित्सीय अनुसंधान में किया जाता है। हालांकि जांच से प्राप्त आंकड़ों के विश्लेषण के लिए विशेषज्ञों, विशेष सॉफ्टवेयर और जटिल तकनीकी प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती है।
आईआईटी मंडी का विकसित बायोफास्टनेट मॉडल बिना जटिल प्री-प्रोसेसिंग के सीधे कच्चे आंकड़ों का विश्लेषण कर सकता है। इससे जांच रिपोर्ट तैयार करने में लगने वाला समय कम होगा और विशेषज्ञों पर निर्भरता भी घटेगी।
शोध में मिला शानदार प्रदर्शन
यह शोध आईआईटी मंडी के इंडियन नॉलेज सिस्टम एंड मेंटल हेल्थ एप्लीकेशंस सेंटर तथा सेंटर फॉर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एंड रोबोटिक्स में किया गया। शोध दल में दुर्गेश अमेटा, हार्दिक शर्मा, डॉ. प्रफुल हंबर्डे और आईआईटी मंडी के निदेशक प्रो. लक्ष्मीधर बेहरा शामिल रहे।
शोध के दौरान बायोफास्टनेट का परीक्षण दो सार्वजनिक बेंचमार्क डाटासेट पर किया गया। फंक्शनल ग्रुप प्रेडिक्शन डाटासेट में इसने 97.81 प्रतिशत की सटीकता हासिल की, जबकि दूसरे डाटासेट पर भी इसने मौजूदा एआई मॉडलों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया।
इन क्षेत्रों में होगा उपयोग
भविष्य में इस तकनीक का उपयोग:
कैंसर ऊतक (Cancer Tissue) विश्लेषण
हिस्टोपैथोलॉजी
संक्रमण फैलाने वाले सूक्ष्मजीवों की पहचान
रक्त और अन्य जैव-द्रवों के विश्लेषण
दवाओं की गुणवत्ता जांच
जैव-चिकित्सीय अनुसंधान
जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में किया जा सकेगा।
अभी क्लीनिकल परीक्षण बाकी
आईआईटी मंडी के कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं रोबोटिक्स केंद्र के सहायक आचार्य डॉ. प्रफुल हंबर्डे ने बताया कि फिलहाल इस तकनीक का मरीजों पर क्लीनिकल परीक्षण नहीं हुआ है। क्लीनिकल वैलिडेशन, नियामकीय मंजूरी और व्यावसायिक एकीकरण के बाद ही इसका नियमित उपयोग अस्पतालों और पैथोलॉजी प्रयोगशालाओं में संभव हो सकेगा।





