
17 सितंबर 2026 | खबर अभी अभी | कुल्लू

कुल्लू। बरसात के कठिन दौर के समापन और नई फसल के आगमन के साथ हिमाचल प्रदेश में पारंपरिक सायर पर्व की खुशियां छा गई हैं। वीरवार, 17 सितंबर को प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में सायर पर्व श्रद्धा, उल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जा रहा है। कुल्लू में पर्व को लेकर पिछले एक सप्ताह से ही बाजारों में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों से महिलाएं बड़ी संख्या में बाजार पहुंच रही हैं और पूजन सामग्री के साथ स्थानीय उत्पादों की बिक्री भी कर रही हैं।
सायर पर्व के महत्व को देखते हुए ऊना जिले के स्कूलों में अवकाश रखा गया है। इसके अलावा मंडी और शिमला जिले के मशोबरा ब्लॉक, सोलन के अर्की उपमंडल, धर्मशाला और कुल्लू में भी स्थानीय अवकाश रखा गया है।
प्रकृति और देवी-देवताओं के प्रति आभार का पर्व
हिमाचली लोक संस्कृति में भादों का महीना भारी बारिश, भूस्खलन और प्राकृतिक आपदाओं के कारण चुनौतीपूर्ण माना जाता है। भादों के समापन और नए महीने के आगाज के साथ मनाया जाने वाला सायर पर्व प्रकृति, देवी-देवताओं और नई फसल के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा से जुड़ा है। किसानों के लिए यह पर्व नई कृषि उपज और बेहतर भविष्य की उम्मीदों का भी प्रतीक माना जाता है।
अखरोट, दूब घास और नई फसल से सजे पूजन
सायर पर्व पर घरों में धान, मक्की, ताजे फल-फूल, अखरोट और नई फसल की पूजा की जाती है। परिवार के सदस्य अपने से बड़ों को अखरोट और द्रुभा यानी दूब घास भेंट कर आशीर्वाद लेते हैं। इसके साथ ही रिश्तेदारों और पड़ोसियों के घर जाकर पर्व की शुभकामनाएं देने की परंपरा भी निभाई जाती है।
हिमाचली पकवानों से महकी रसोई
सायर पर्व पर घरों में विशेष हिमाचली पकवान तैयार किए जाते हैं। पतरोड़े, भल्ले और कचोरी जैसे पारंपरिक व्यंजनों से रसोई महक उठती है। लोग इन पकवानों को एक-दूसरे के साथ बांटकर आपसी भाईचारे और खुशियों का संदेश देते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में सायर पर्व का अलग ही रंग देखने को मिलता है। कई स्थानों पर अखरोट से पारंपरिक खेल खेले जाते हैं और दिनभर उत्सव जैसा माहौल बना रहता है। इस तरह सायर पर्व हिमाचल की समृद्ध लोक संस्कृति, कृषि परंपराओं और प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव को जीवंत करता है।
रिपोर्ट: सुशांत शर्मा, कुल्लू





