हिमाचल का डेयरी किसान आखिर जाए तो जाए कहाँ?

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हिमाचल का डेयरी किसान आखिर जाए तो जाए कहाँ?”
आज हालात ऐसे बन गए हैं कि किसान अपनी मेहनत से पैदा किया गया शुद्ध देसी दूध बेचने की बजाय लोगों को मुफ्त में बांटने को मजबूर है। यह कोई समृद्धि की निशानी नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का दर्दनाक उदाहरण है।


समय पर भुगतान नहीं, बार-बार मिल्क हॉलीडे, दूध खरीद पर विभिन्न पाबंदियाँ और बढ़ती उत्पादन लागत ने डेयरी किसानों की कमर तोड़ दी है। जिस दूध से किसान अपने परिवार का पालन-पोषण करता था, आज वही दूध सड़कों पर मुफ्त बांटना उसकी मजबूरी बन गया है।
किसान को दान नहीं, उसकी मेहनत का उचित मूल्य चाहिए। यदि यही स्थिति रही तो आने वाले समय में डेयरी व्यवसाय से किसानों का मोहभंग होना तय है, जिसका असर पूरे प्रदेश की दुग्ध व्यवस्था पर पड़ेगा।
किसान की मेहनत का सम्मान हो, समय पर भुगतान हो और डेयरी क्षेत्र को बचाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएँ।

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