जलवायु परिवर्तन की मार: हिमाचल का राज्य पुष्प बुरांश संकट में, 2090 तक सिमट सकते हैं जंगल

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हिमाचल प्रदेश में जलवायु परिवर्तन का असर अब राज्य पुष्प बुरांश (रhododendron) पर भी साफ दिखाई देने लगा है। वैज्ञानिकों के ताजा अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि बढ़ते तापमान और बदलते वर्षा पैटर्न के कारण बुरांश के पेड़ निचले क्षेत्रों से ऊंचाई वाले ठंडे इलाकों की ओर खिसक रहे हैं। यदि यही स्थिति बनी रही तो वर्ष 2070 और 2090 तक बुरांश के जंगलों का क्षेत्रफल तेजी से घट सकता है।

अध्ययन के अनुसार गुलाबी बुरांश, जो हिमाचल प्रदेश का राज्य पुष्प है, जलवायु परिवर्तन के कारण गंभीर संकट का सामना कर रहा है। शोधकर्ताओं ने हिमाचल के 95 प्रमुख स्थानों से जुटाए गए आंकड़ों और मैक्सएंट कंप्यूटर मॉडलिंग के आधार पर भविष्य के जलवायु परिदृश्यों का विश्लेषण किया। रिपोर्ट में पाया गया कि तापमान में बदलाव बुरांश के अनुकूल आवास को सबसे अधिक प्रभावित कर रहा है, जिसका योगदान 58.6 प्रतिशत है। वहीं, वर्षा के बदलते पैटर्न का प्रभाव 14.8 प्रतिशत दर्ज किया गया।

वर्तमान में हिमाचल प्रदेश का लगभग 4,508 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र बुरांश के लिए अनुकूल माना जाता है। यह वृक्ष मुख्य रूप से बान और देवदार के साथ घने वन पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा है। वैज्ञानिकों ने दो संभावित भविष्यवाणियां पेश की हैं। पहली के अनुसार यदि कार्बन उत्सर्जन में कमी लाई गई तो बुरांश के अनुकूल क्षेत्रों में कुछ विस्तार संभव है। दूसरी और अधिक चिंताजनक संभावना यह है कि प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग बढ़ने पर इसके जंगल तेजी से सिमट जाएंगे।

शोधकर्ताओं ने चंबा के कालाटॉप-खजियार, सोलन के चैल और सिरमौर-शिमला क्षेत्र के चूड़धार वन्यजीव अभयारण्य को बुरांश के लिए संभावित जलवायु-सुरक्षित क्षेत्र बताया है। इन क्षेत्रों में भविष्य में भी बुरांश के अस्तित्व की संभावना अपेक्षाकृत अधिक मानी जा रही है।

यह अध्ययन डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, सोलन सहित देश के विभिन्न शोध संस्थानों के वैज्ञानिकों द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बुरांश केवल एक सुंदर पुष्प ही नहीं, बल्कि जंगलों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली ‘कीस्टोन प्रजाति’ भी है। इसके फूलों से बनने वाले जूस, औषधीय उत्पाद और अन्य वन आधारित गतिविधियां स्थानीय लोगों की आजीविका का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वैज्ञानिकों ने बुरांश के संरक्षण के लिए चिन्हित अभयारण्यों में विशेष निगरानी और स्थानीय समुदायों की भागीदारी से संरक्षण योजनाएं लागू करने पर जोर दिया है।

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