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शिमला:
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महिला की शिकायत पर स्वास्थ्य विभाग को निर्देश दिए हैं कि सक्षम प्राधिकारी मामले की जांच तार्किक आधार पर छह सप्ताह के भीतर पूरी करे और अंतिम निर्णय की जानकारी याचिकाकर्ता को उपलब्ध कराए। महिला ने आरोप लगाया है कि उसके पति को बचाने के लिए स्वास्थ्य विभाग की ओर से फर्जी दिव्यांगता प्रमाणपत्र जारी किया गया है।
न्यायमूर्ति ज्योत्सना रिवाल दुआ की अदालत ने यह आदेश एक तलाकशुदा महिला द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किए।
पति को 40% मानसिक दिव्यांग घोषित करने पर उठाए सवाल
याचिका के अनुसार महिला की शादी प्रतिवादी से हुई थी, जिसने कथित तौर पर उसे तलाक-ए-हसन दे दिया। इसके बाद महिला ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत सुरक्षा, भरण-पोषण और अन्य राहत के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
इसी दौरान महिला को जानकारी मिली कि उसके पति के नाम 20 सितंबर 2025 को जारी दिव्यांगता प्रमाणपत्र में उसे 40 प्रतिशत मानसिक बीमारी से ग्रस्त बताया गया है।
‘पति पूरी तरह स्वस्थ, प्रमाणपत्र फर्जी’
महिला का दावा है कि उसका पति पूरी तरह स्वस्थ है और उसे किसी प्रकार की मानसिक दिव्यांगता नहीं है। उसने आरोप लगाया कि संबंधित चिकित्सा अधिकारी ने नियमों के विपरीत एक स्वस्थ व्यक्ति के नाम पर दिव्यांगता प्रमाणपत्र जारी कर दिया।
जांच के आदेश के बावजूद कार्रवाई लंबित
महिला ने इस मामले की शिकायत स्वास्थ्य विभाग से की थी। विभाग ने शिकायत पर संज्ञान लेते हुए जांच के आदेश तो जारी किए, लेकिन महिला का आरोप था कि जांच को लंबे समय से लंबित रखा गया और उसे पूरा नहीं किया गया।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि स्वास्थ्य विभाग को निर्धारित समयसीमा में जांच पूरी करने का निर्देश दिया जाए।
हाईकोर्ट का आदेश
दोनों पक्षों की दलीलें और रिकॉर्ड पर उपलब्ध दस्तावेजों का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने रिट याचिका का निपटारा करते हुए स्वास्थ्य विभाग के सक्षम प्राधिकारी को छह सप्ताह के भीतर जांच पूरी करने तथा अंतिम निर्णय से याचिकाकर्ता को अवगत कराने के निर्देश दिए हैं।





