
खबर अभी अभी
शिमला:
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) में अनुबंध के आधार पर कार्य कर चुके अधिकारियों को बड़ा झटका देते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी है। याचिका में अधिकारियों ने नियमितीकरण (Regularization) से पहले की अनुबंध सेवा को पेंशन लाभ के लिए अर्हक सेवा (Qualifying Service) में शामिल करने की मांग की थी।
न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल की अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यदि कोई कर्मचारी नियुक्ति और स्थायी समायोजन (Permanent Absorption) के समय लागू नियमों एवं शर्तों को बिना किसी आपत्ति के स्वीकार करता है, तो बाद में वह उन्हीं शर्तों को चुनौती नहीं दे सकता।
2008 में हुई थी अनुबंध पर नियुक्ति
अदालत के समक्ष आए रिकॉर्ड के अनुसार याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति वर्ष 2008 में दो वर्ष के अनुबंध पर अधिकारी (विपणन एवं वसूली-ग्रामीण) के पद पर हुई थी। नियुक्ति पत्र में स्पष्ट उल्लेख था कि यह अनुबंध सेवा उन्हें स्थायी नियुक्ति का कोई अधिकार नहीं देती और इस अवधि के दौरान वे बैंक के प्रोविडेंट फंड या पेंशन फंड के सदस्य बनने के पात्र नहीं होंगे। कर्मचारियों ने इन सभी शर्तों को बिना किसी विरोध के स्वीकार किया था।
2010 में स्थायी नियुक्ति पर भी दी थी सहमति
वर्ष 2010 में जब बैंक ने इन अधिकारियों को स्थायी रूप से नियुक्त करने का प्रस्ताव दिया, तब भी नियुक्ति पत्र में स्पष्ट किया गया था कि वे डिफाइंड कंट्रीब्यूटरी पेंशन स्कीम (Defined Contributory Pension Scheme/New Pension Scheme) के अंतर्गत आएंगे, न कि पुरानी पेंशन योजना (OPS) के। कर्मचारियों ने इस प्रस्ताव पर भी हस्ताक्षर कर अपनी सहमति दी थी।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
अदालत ने कहा कि कर्मचारी अपनी इच्छा से नियुक्ति की शर्तों को स्वीकार करने के बाद वर्षों बाद उन शर्तों को बदलने या उनसे अलग लाभ की मांग नहीं कर सकते। इसलिए अनुबंध अवधि को पेंशन के लिए अर्हक सेवा में जोड़ने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट ने इसी आधार पर याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट कर दिया कि नियमितीकरण से पहले की अनुबंध सेवा को पेंशन लाभ के लिए अर्हक सेवा नहीं माना जाएगा।





